सरदार वल्लभभाई पटेल
sardar vallabhbhai patel
[सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में लौह पुरुष के रूप में विख्यात थे। भारत के स्वतंत्र होते ही उन्होंने भारतीय रियासतों का राज्य में विलीनीकरण कर रियासतों की जनता को अनेक कष्टों से बचाया। भारतीय स्वातंत्र्य-संग्राम में वह महात्मा गाँधी के दाहिने हाथ समझे जाते थे। उनके संबंध में केंद्रीय लोकसभा के अध्यक्ष श्री जी. वी. मावलंकर ने जो संस्मरण लिखा है, उससे उनकी विशेषताओं का पूरा परिचय मिल जाता है आगे की पंक्तियों में उसे ही पढ़िए।]
मेरा ध्यान सन् 1913 की ओर वापस जाता है। सरदार 13 फ़रवरी, 1913 को जहाज़ से बंबई उतरे और दूसरे दिन सबेरे अहमदाबाद आए। वे उस समय के चीफ़ जस्टिस सर बसिल स्काट से भलीभाँति परिचित थे और इसलिए स्वभावतः उनसे बंबई में मिले। सर बसिल ने बड़ी आवभगत से उन्हें लिया और यदि वल्लभभाई रुक जाएँ, तो सभी तरह की सहायता देने का वचन दिया, जिसमें गवर्नमेंट लॉ स्कूल की अध्यापिका भी सम्मिलित थी। कॉलिज उस समय स्कूल कहलाता था, पर बंबई की कानूनी दुनिया की सर्वोच्च जगह के लिए वल्लभभाई के दिल में कोई आकर्षण और इच्छा नहीं थी, और उन्होंने अहमदाबाद आने को विशेषता दी। अपने आदमियों की सेवा करने की उनकी अपनी योजनाएँ थीं और भावी सार्वजनिक कार्यों के लिए उन्होंने अहमदाबाद को केंद्र चुना। यह कैसा संयोग था कि दो वर्ष के पश्चात् गाँधीजी ने भी इसी स्थान को चुना। देश के सभी मित्र अहमदाबाद की जनता के अभिमान और देशभक्ति की सराहना अवश्य करेंगे, जब कि उनके हृदय यह सोचकर प्रफुल्लित है कि पिछले तीस सालों में उन्होंने—उनके शहर ने हिंदुस्तान को, राष्ट्रीयता को मूर्तरूप देने और इसका नेतृत्व करने में इतना महान योग दिया है।
एक फुर्तीला नौजवान अच्छे कटे हुए सूट और फेल्ट हैट पहने था, प्रभावशाली और चमकीली आँखोंवाला यह व्यक्ति बहुत बातचीत न करता था, अपने अतिथि का स्वागत वह केवल एक मुस्कान से ही करता था, स्थिर और उदास चेहरे के साथ ऐसा मालूम होता था कि वह अन्य सबको नीची निगाह से देखता है, वह जब कभी बात करता उसमें विश्वास और श्रेष्ठता की झलक प्रकट होती और उसका रुख़ हमेशा कठोर और गंभीर मालूम होता था। इस भाँति का वही नया बैरिस्टर था जो वकालत करने के लिए अहमदाबाद आया था। नया वैरिस्टर स्वभावतः अन्य मातहत वकीलों के लिए ध्यान देने की वस्तु था। उसका व्यक्तित्व और आचरण, सभी अपना आकर्षण रखते थे। ऐसा मालूम होता था कि वह आकर्षण, सम्मान, भय की भावनाओं के साथ ही शायद अधिकृत उपेक्षा की दृष्टि से भी दूसरों की ओर देखता है।
एक वकील की दृष्टि से अधिकतर वे फ़ौजदारी के मुक़दमे करते थे। वे गवाहों से बहुत थोड़ी जिरह करते थे, लेकिन वह असली होती थी; साथ ही आदमी परखने की उनमें इतनी अच्छी प्रतिभा थी कि गवाह पर एक तीखी दृष्टि डालने से ही वे समझ जाते थे कि यह किस भाँति का है और उसी के अनुसार उससे जिरह करते थे। मुक़दमा करते समय उनकी तथ्य-संबंधी पटुता और विरोधी पक्ष का उचित और सही अंदाज़ भलीभाँति प्रकट हो जाता था। वे मुक़दमे का बचाव और विरोधी पर आक्रमण भी बहुत देखभाल के बाद करते थे। लेकिन सबसे अधिक आकर्षक विशेषता, जिसने हर एक का ध्यान आकर्षित कर उनके प्रति प्रेम उत्पन्न किया, यह उनकी निर्भीकता थी। वे जज को शिष्टाचार की सीमाओं से ज़रा भी परे न होने देते और न अदालत का अन्यायपूर्ण और अनुचित रूप से पुलिस या सरकारी पक्ष की ओर झुकना ही सहन कर सकते थे।
वकालत करते समय धन कमाना अथवा आराम और व्यक्तिगत आनंद का जीवन व्यतीत करना उनका आदर्श नहीं था। वे एक निर्धन माता-पिना की संतान थे। एक किसान की तरह उनका पालन-पोषण हुआ और साथ ही वे ग्रामीणों की परेशानियों को भी जानते थे। इसी से सदैव जाति-सेवा का विचार उनमें रहता था। उन्हें अपनी पढ़ाई के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ा था और वह पूरी तरह से आत्मनिर्भर रहे थे। पहले दिनों की इन परेशानियों ने ही उन्हें आज का व्यक्ति बनाया। प्रतिभा के साथ ही आत्म-निर्भरता, दृढ़ निश्चय और अध्यवसाय आदि गुण उन्हें दैवी वरदान के रूप मे मिले थे।
श्रीवल्लभभाई भारतवर्ष आते ही तुरंत सार्वजनिक-जीवन में प्रविष्ट नहीं हुए, यद्यपि यह उनके जीवन का विशेष उद्देश्य था। वह सावधानी से देख रहे थे और संपर्क स्थापित कर रहे थे। उस समय सार्वजनिक जीवन केवल वकील वर्ग तक ही सीमित था। गाँधीजी भी, जिन्होंने कि 1915 में अहमदाबाद सत्याग्रह आंदोलन आरंभ किया था, इच्छुक थे कि अहमदाबाद के जनप्रिय नेताओं से संपर्क स्थापित करे। इसी विचार से वे गुजरात-क्लब में एक या दो बार गए कि वहाँ अपने सत्याग्रह-आश्रम के विचार लोगों को समझा सके। वल्लभभाई बिल्कुल अलग रहे और वे गाँधीजी के विचारों और योजनाओ के विषय में संदेह करते तथा आलोचना किया करते थे। वे अपना दृष्टिकोण व्यक्त करने में बड़े बेरहम और रूख़े थे। जब गाँधीजी क्लब में आए, उस समय वल्लभभाई अपने साथी के साथ ब्रिज खेल रहे थे। श्रीठाकर और मैं उनके पास बैठे हुए खेल देख रहे थे। जब मैं उस स्थान पर जाने को उठने लगा, जहाँ पर गाँधीजी थे, वल्लभभाई ने व्यक्तियों के द्वारा मुझे हतोत्साहित कर वहाँ जाने और सुनने से रोका। क्या कोई उस समय सोच भी सकता था कि यही आदमी गाँधीजी के दर्शन का एक विश्वस्त अनुयायी और मेहमान भक्त होगा तथा उनके नेतृत्व में दृढ़ विश्वास रखेगा? लेकिन यह परिवर्तन धीरे-धीरे गाँधीजी के संपर्क और सहकारिता का परिणाम था, जो उनकी निःस्वार्थ देशभक्ति और विशेष रूप से निर्धन और दलित वर्ग की सेवा में था।
इस तरह गाँधीजी के अहमदाबाद आने के दो वर्षों तक वल्लभभाई उनसे दूर बने रहे। उन्होंने 1916 में अहमदाबाद म्यूनिसिपैलिटी में जाकर अपना सार्वजनिक जीवन स्वतंत्र रूप से आरंभ कर दिया था। अपने काम के द्वारा अपने आपको पूर्ण सिद्ध करने में उन्हें समय नहीं लगा। प्रबंध का पूर्ण विवरण प्राप्त करने में न तो उन्होंने समय छोड़ा और न अव्यवसाय ही; और सफ़ाई कमेटी के चेयरमैन के रूप में उन्होंने गहर की बड़ी सेवा की।
1896 से लेकर अकेला अहमदाबाद प्लेग से बचा हुआ था, जब कि देश के दूसरे भागों में बीमारी से वहुत विध्वंस हो गया था। अक्टूबर 1917 के लगभग स्थिति कुछ गंभीर हो गई। सबसे पहली बार लोग घर से बाहर झोपड़ों में रहने गए और यहाँ तक कि कचहरियाँ भी बंद हो गई। सफ़ाई-कमेटी के प्रधान का उत्तरदायित्व बहुत भारी था। श्रीवल्लभभाई अपने स्थान पर जमे रहे। वे गहर में बने रहे और सदैव अपने म्युनिसिपल कर्मचारियों के साथ शहर में इधर-उधर घूमते दिखाई पड़ते थे। यह सबसे नया कार्य था, जो पूर्ववर्ती नगर-पिताओं के कार्य से एकदम विचित्र था।
अहमदाबाद भी गुजरात सभा में सम्मिलित हो गया। सभा एक राजनीतिक संघटन था, जो 1884 में पूरे गुजरात के लिए आरंभ किया गया था और पुरानी उदार परंपरा के आधार पर काम कर रहा था। 1916 में बंबई प्रांतीय सभा का अधिवेशन (संभवतः 16वाँ अधिवेशन) अहमदाबाद में श्रीमुहम्मदअली जिन्ना के सभापतित्व में हो रहा था। बल्लभभाई ने इसमें कोई विशेष भाग नहीं लिया, यद्यपि वे इसमें सम्मिलित हुए। वे अपनी म्युनिसिपैलिटी के काम में लगे रहे।
लगभग जुलाई 1917 में सर्वश्री वल्लभभाई हीरालाल देसाई गुजरात के मंत्री और संयुक्त मंत्री चुने गए। इस क्लब में ही एक दिन दुपहर के पश्चात हम लोगों ने गाँधीजी की साहसिक अचलता का समाचार सुना, जो कि उन्होंने मोतीहारी (बिहार) की अदालत में मज़िस्ट्रेट के विरुद्ध अपनाई थी, जिसने उनकी जाँच पर प्रतिबंध लगा दिया था, और जिसे वे बिहार में योरोपियन बाग-मालिक के मज़दूरों की परिस्थिति के बारें में करना चाहते थे। गाँधीजी के हिंसात्मक विरोध का यह सबसे पहला लक्षण था। गाँधीजी ने मजिस्ट्रेट की आज्ञा मानने से इंकार कर दिया और जाँच छोड़ने की अपेक्षा जेल जाना पसंद किया। गाँधीजी के इस कार्य ने क्लब में हम सभी को सजग कर दिया। स्वर्गीय दीवान बहादुर हीरालाल देसाई उछल पड़े और अपने हाथ घुमाते हुए कह उठे मावलंकर, यही एक बहादुर आदमी है और हमें अवश्य इसको अपना (गुजरात सभा) का सभापति बनाना चाहिए।
यही अवसर था, जिसने वल्लभभाई का ध्यान गुजरात सभा की ओर आकर्षित किया, जो अभी तक म्युनिसिपैलिटी के कार्य तक ही सीमित ये। गाँधीजी ने सभापति बनने का हमारा प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और यही से वल्लभभाई गाँधीजी के कार्यों और कार्य-प्रणालियों के निकट आने लगे। वल्लभभाई वीर तो थे ही, गाँधीजी में भी उन्होंने अपनी बहादुरी की प्रतिध्वनि पाई। मातृभूमि की सेवा में दोनों की पारस्परिक सहकारिता इस समय से ही आरंभ हुई।
सभा का कार्य क्षेत्र बहुत विस्तृत था और उन सभी कार्यों में वे कमेटी के सदस्य के रूप में सम्मिलित रहते और कभी-कभी पदाधिकारी भी होते थे। सौभाग्यवश सभा का मंत्री होने के कारण में उनके निकट अधिकाधिक आता गया, जैसे ही हमारा काम बढ़ा। सभा का एक सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण राजनैतिक काम था कि किस भाँति कैरा के किसानों की समस्या हल की जाए जिनकी फ़सल 1917 के मानसून के कारण ख़राब हो गई थी।
सभा सभी सरकारी कर्मचारियों के पास डेपुटेशन लेकर गई—कैरा के कलेक्टर से लेकर सरकार तक और इस विषय में सभी प्रभावशाली व्यक्तियों का सक्रिय सहयोग प्राप्त किया। लेकिन नौकरशाही कठोर बनी रही और इसी विषय को आगे बढ़ाना आवश्यक हो गया। सभा के सभी सदस्य गाँधीजी की कार्यवाही-संबंधी योजना से पूर्ण सहमत थे, किंतु यह अधिक अच्छा समझा गया कि एक स्वतंत्र कमेटी संगठित की जाए, जो सरकार पर दबाव डालकर मामला आगे बढ़ावे और गाँधीजी ने सरकार से लिखा वहीं आरंभ कर दी तथा हम सभी लोग अपने मामले के लिए प्रमाण इकट्ठे करने लगे। यही 1917-18 के कैरा के लगान-विरोधी मोर्चे की भूमिका थी, जो अपने विषय का सबसे प्रथम सर्वप्रिय आंदोलन था और जिसने निर्भीकता-पूर्वक सरकार के कामों को चुनौती दी तथा जनता ने जिनकी शक्ति के प्रति विश्वास किया।
आंदोलन की सारी कहानी बड़ी मनमोहक है, लेकिन उसका वर्णन यहाँ नहीं किया जा सकता। यहाँ इतना कहना ही काफ़ी है कि गाँधीजी ने कैरा ज़िले में केंद्र बनाने का निश्चय किया, लेकिन वे मोतीहारी में व्यस्त थे। अतः वे यहाँ लगातार नहीं रह सकते थे। समय बहुत उपभोगी था। आंदोलन-विषय और संगठन भंग नहीं किया जा सकता था और इस कारण वल्लभभाई को गाँधीजी का सहकारी बनने का भार अपने कंधों पर लेना पड़ा था तथा उन्होंने गाँधीजी के साथ कैरा ज़िले में कार्य करने का निश्चय किया। यह उनका अपना ज़िला था और यहाँ उन्होंने अपना बचपन बिताया था। यहाँ के लोग बहादुर थे और वल्लभभाई को अच्छी तरह जानते थे। गाँधी जी को इनसे अच्छा सहकारी न मिल सकता था। वल्लभभाई ने दिलजान से अपने आपको आंदोलन के पीछे लगा दिया और हमारा कार्यालय भी अहमदाबाद से नडियाद परिवर्तित हो गया। गाँधीजी आंदोलन को देखने और चलाने के लिए यहाँ रहने लगे हम सबके लिए यह एक विशेष अवसर था, जिसमें हम लोगों ने गाँधीजी के मस्तिष्क और तरीक़े का अध्ययन किया और साथ ही राजनीतिक क्षेत्र में उनके सत्याग्रह-संबंधी सत्य और अहिमा के प्रभाव की सराहना की। यहाँ पर ही पहली बार वल्लभभाई साधारण जनता के बीच घूमते हुए दिखाई देते थे, अपना हैट, कोट और पैंट छोड़कर सादी धोती और क़मीज़ में दिन-रात इधर-उधर फिरते थे। हिंदुस्तान में सत्याग्रह का पहला प्रयोग सफल हुआ और दूसरों की भाँति वल्लभभाई भी गाँधीजी के प्रशंसक और अनुयायी बन गए।
इसके पश्चात् 1919 ई० मे राष्ट्रीय आंदोलन का एक बड़ा संकटपूर्ण समय आया। रौलट ऐक्ट और जलियान वाला बाग़ ने राष्ट्र को मजग कर दिया। 9 अप्रैल की ऐतिहासिक हड़ताल, सत्याग्रह का प्रस्ताव, पलपल मे गाँधीजी की गिरफ़्तारी, अहमदाबाद मे 11 अप्रैल, 1919 के दिन की नागरिक हलचल, बर्बादी के रूप में सरकार-विरोधी भावनाओ का प्रदर्शन, जो कुछ जनता ने सरकारी भवनों और पुलिस चौकियों पर किया था इस भाँति की सभी घटनाएँ बड़ी तेज़ी के साथ बढ़ रही थी। 1919 ई० के उपद्रवों में वल्लभभाई ने कुछ अभियुक्तों की पैरवी की। क़ानूनी सलाहकार के रूप में यही उनके अंतिम काम थे।
1919 के पश्चात् इंडियन नेशनल कांग्रेस के दृष्टिकोण मे बड़ा आश्चर्य-जनक परिवर्तन हुआ। सितंबर 1920 में कलकत्ता अधिवेशन ने अहिंसात्मक आंदोलन को योजना स्वीकार कर ली और अहमदाबाद म्यूनिसिपैलिटी भी इसे व्यावहारिक रूप देने में पीछे न रही। जल्दी ही में उसके बाद नागपुर अधिवेशन आया। इसके बाद दिसंबर, 1921 में अहमदाबाद में अधिवेशन करने का निमंत्रण दिया गया और मारा देण उस साल के असहयोग प्रस्ताव से उत्साहित और सजीव हो उठा। सरदार वल्लभभाई पटेल बंबई प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के सर्वप्रथम अध्यक्ष थे और अपने मित्र श्री इंदुलाल याजनिक के साथ मुझे सर्वप्रथम मंत्री होने का अधिकार मिला।
जब अहमदाबाद मे 36वीं कांग्रेस की स्वागत-समिति के वल्लभभाई प्रधान थे, मैं उनका प्रधान मंत्री था और उस समय हम लोग गाँधीजी से पूरी तरह परिचित हो गए। उन दिनों शिक्षा के विषय में किया गया म्यूनिसिपल आंदोलन तथा अहमदाबाद म्यूनिसिपैलिटी का तद्विपयक इतिहास स्थानीय सस्थाओं के किसी भी विद्यार्थी के लिए आकर्षक विषय हो सकता है, जो राष्ट्रीय विकास में इन समस्याओं की सहायता का महत्त्व देखना चाहता है, बशतें कि नगर-पिता निस्वार्थ सेवा और त्याग की भावना से प्रेरित हों।
1921 से लेकर अब तक उनके सार्वजनिक काम जनता को भली-भाँति विदित है, और मैं उनका विवरण देना आवश्यक भी नही समझता। 1922 मे नागपुर का झंडा-सत्याग्रह उनका कांग्रेस का सभापति होना, 1928 में वारदोली आंदोलन, 1930-31, 1932-34, 1940-41 और 1942-45 के सविनय अवज्ञा आंदोलन, कांग्रेस कार्यसमिति और पार्लियामेंटरी बोर्ड के सदम्य के रूप में किए गए कार्य जनता के दिमाग़ में ताज़े है। वे महान् प्रबंधक, बड़े संगठनकर्ता और एक महान् योद्धा थे। लेकिन वल्लभभाई का यह चित्र अधूरा ही रहेगा, यदि में कुछ व्यक्तिगत विशेषताओ को इंगित न करूँ। वे एक विश्वास-प्रिय मित्र थे और सभी परिस्थितियों में मित्रों और सहयोगियों के प्रति आज्ञाकारिता की भावना उनमें विलक्षण थी। उनका हृदय बड़ा कोमल और दयार्द्र था। जो कठोर और स्थिर भाव के कारण उन लोगो से छिपा हुआ है, जो उनके निकट संपर्क में थे। मनुष्य और विषय के बारे में उनकी कुशलता और ठोस निर्णयात्मक बुद्धि के होने पर भी वे बच्चों की भाँति सरल और विश्वास-भाजन थे, लेकिन वह उन्ही के लिए जिन्हें वे अपने विश्वास का अधिकारी समझने थे। वे हर चीज़ को तौलते और कार्य-प्रणाली को उसी ओर मोड़ देते थे, जिसकी प्राप्ति को वह देश के लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण समझते। उनकी हाज़िर-जबाबी और हास्य सब उनके अपने थे और बड़ी संकटपूर्ण स्थिति में भी उनके साथ आप इसक कारण प्रसन्न रह सकता था।
- पुस्तक : संस्मरण और आत्मकथाएँ (पृष्ठ 48)
- रचनाकार : गणेश वासुदेव मावलंकर
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.