वसंत पंचमी के अवसर पर प्रयाग गया था। निराला जी कठिन बीमारी भोगकर उठे थे, सोचा कि इस वर्ष उनके साथ ही उनकी जयंती मना लूँ। अगले वर्ष यह अवसर आए कि न आए। निराला जी दुर्बल होने पर भी स्वस्थ थे, ख़ूब मग्न थे। लोग पैर छूकर उन्हें हार पहनाना चाहते थे और नउआ उनकी दाढ़ी बनाते हुए अपना महत्त्व जतलाकर अपने-अपने हारो को निराला जी के चरणों पर रखने के लिए अच्छो-अच्छो को बड़ी शान से आदेश दे रहा था।
इस बार फिर वसंत पंचमी आई—निराला जी के निधन के बाद पहली वसंत पंचमी। पत्र-पत्रिकाओं ने विशेषांक निकाले, जगह-जगह निराला परिषदों का उद्घाटन किया गया, बड़े हो-हल्ले हुए। मरने के बाद दिल्ली के राष्ट्रपति-भवन में भी निराला जी की आरती उतारी गई।
वसंत पंचमी से छः-सात दिन पहले गढ़ाकोला ग्राम से निराला जी के भतीजे श्री बिहारीलाल त्रिपाठी और उनके अन्य दो चार सगे-संबंधी मेरे यहाँ आए। वे लोग गढ़ाकोला में निराला जयंती मनाना चाहते थे, और इस तौर-तेवर के साथ आए थे कि लाट साहब को वहाँ ले चला जाए। उनमें से एक बंधु तो अपने भोलेपन में पूरी स्कीम बखान गए। बोले, हमने पहले विचार किया कि सीधे लाट साहब के पास चलें। निराला जी के नाम पर 'ना' तो वे कर ही नही सकते, और करते भी तो हम कहते कि हम पत्रों में आपकी आलोचना करेंगे। अपनी आलोचना से तो सभी घबराते है, सो वो राज़ी हो जाते।
मुझे लगा कि ये लोग निरे भोलेपन में अपनी अहता को तुष्ट करने के लिए निराला जी रूपी लाठी के द्वारा बड़े-बड़ों को हाककर अपने गरब- गुमान के बाड़े में बंद कर लेना चाहते है।
बिहारीलाल जी ने अधिक समझदारी की बातें की। कहने लगे, 'निराला काका हमारे भी तो थे। हम लोग गरीब है, पर यथाशक्ति अपने यहाँ भी निराला काका का उत्सव मनाना चाहते है। आप जैसा कहगे, वैसा करेंगे।
मैंने कहा, इस साल तो किसी भव्य आयोजन के लिए समय नहीं रहा। आप लोग सीधे-सादे ढंग से निराला जयंती मना लें। अगले वर्ष कोई बड़ा आयोजन कीजिएगा।
वे लोग इस बात पर राज़ी हो गए। तय हुआ कि मैं वसंत पंचमी के दिन सुबह पहली बस से पुरवा पहुँच जाऊँ। वहाँ से वे लोग मुझे गढ़ाकोला ले जाएँगे।
सुबह साढ़े आठ-नौ तक बस पुरवा पहुँच गई। चुनाव के दिन थे ही। बस के अड्डे के पास ही हलवाइयों की दुकानों के अलावा कांग्रेस और जनसंघ की चुनाव-दुकानें भी सुनी हुई थी। लाल, पीली, सफ़ेद टोपियाँ नज़र आ रही थी। लाउडस्पीकर पर 'य कहानी है दीये की और तूफान को, निर्बल में लड़ाई बलवान की' वाला फ़िल्मी रिकार्ड बड़े ज़ोर-शोर से बज रहा था।
हम बस से उतरे। यहाँ सब कुछ था, मगर गढ़ाकोला पार्टी के लोग कहीं नहीं दिखलाई पड़े। आध घंटे के बाद आख़िर बिहारीलाल जी दो अन्य व्यक्तियों के साथ साइकिलों पर आ पहुँचे। उन्हें देखकर जान में जान आई। तभी एक दूसरी समस्या उपस्थित हुई। बिहारीलाल जी ने किसी से बैलगाड़ी का प्रबंध दिया था। ऐन समय पर लढ़ापति ने लटा देने से इंकार कर दिया। पुरवा में दो-तीन इक्के तो अवश्य खड़े थे। पर वे चुनाव के दिनों में एक खादीधारी-नेतानुमा व्यक्ति वो गढ़ाकोला ले जाने के लिए पाँच रुपए माँग रहे थे।
बिहारीलाल जी बड़े शशोपंज में पड़े।
मैं स्वयं भी थोड़े रुपए लेकर ही घर से चला था। इसलिए एक और के पाँच रुपए रेट पर राज़ी न हुआ।
अब क्या किया जाए। सामने तीन साइकिलें ही नज़र आ रही थी।
साइकिल चलाना में वाजिब ही वाजिब जानना हूँ। तीस-पैंतीस साल पहले अपने साइकिलधारी मित्रों के दबाव से मैंने यह करतब सीखा था। उन दिनों मैं बहुत मोटा था। इसलिए साइकिल ऐसी सवारी मुझे नापसंद थी। केवल दोस्तों के साथ सैर करने के लिए कभी-कभी मजबूरन उसका प्रयोग करना पड़ता था। किसी फ़ुटपाथ के सहारे साइकिल पर सवार होकर जाया करता। जब उतरना होता तो साइकिल को झुकाकर उतर पड़ता। सन् '37 में एक बार में साइकिल से गड़बड़ाकर ताज़ा कोलतार पड़ी हुई सड़क पर गिर पड़ा था। तब से फिर कभी साइकिल पर चढ़ने का नाम तक न लिया।
लेकिन यहाँ साइकिल के अलावा और कोई साधन ही नज़र न आया। सोचा कि बजरंग बली का नाम लेकर अब इसी पर चढ़ा जाए। जो होगा सो देखा जाएगा।
एक जगह टाँग उछालने-भर का एक ज़रा ऊँचा-सा मिट्टी या ढूह था, उसके सहारे साइकिल पर सवार हो गया। कच्ची बलुहा सड़क पर नहर के किनारे-किनारे हम चल पड़े। रास्ते भर मनाते चले जा रहे थे कि हे राम जी, कहीं लद्द से गिर न पड़ें जिससे हमारी हँसी उड़े।
गाँव अब आध पौन मील ही दूर रह गया था। तभी एक और विक्ट समस्या आई। सामने छः-सात बैलगाड़ियाँ एक पंक्ति में चली जा रही थी। सोचने लगा इनसे बचकर कैसे निकलूँगा। साथी भी शायद मेरी परिस्थिति को समझ गए। आगे बढ़कर सढ़ेवालो को एक ओर हो जाने के लिए हुल्लड़ मचाने लगे। पर वहाँ जगह ही न थी। मैं उतर पड़ा। उन लोंगो से कहा, आप लोग चलिए। हम और बिहारीलाल जी पैदल आते हैं।
अपनी साइकिल मुझे दे देने के कारण बिहारीलाल जी एवं साइकिल के कैरियर पर बैठकर आ रहे थे। इससे उनकी भी हड्डी-पसलियाँ बोल गई थी।
हम दोनों पैदल चलकर बड़े सुखी हुए। राहें चलते बातें होने लगीं। पता लगा कि शिवधारी त्रिपाठी के चार लड़के हुए
पुलिस में उन्हें नौकरी मिल गई। होते-करते ज़मादार हो गए। फिर हुआ लाट साहेब के मन चढ़ गए और उनकी अरदली मे चले गए। लाट साहेब हमेशा राममहाय बाबा को अपने साथ-साथ रखे। तो एक बार महिपादल महराज के हिया लाट साहेब गए। महिपादल महराज ने राममहाय बाबा को देखा तो लाट साहेब में कहा कि इन्हे हमें दे दीजिए, हमारे यहाँ ऐसा कोई ज़मादार नहीं है। लाट साहेब ने उन्हें दे दिया। रामसहाय बाबा महिपादल में रहने लगे। फिर सान-भर बाद रामलाल बाबा भी वही चले गए।
बँगाल की महिपादल स्टेट में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के पहुँचने की एवं क्या मैं लखनऊ में भी सुन चुका था। यहाँ रामकृष्ण मिशन में एक सन्यासी रहने थे। उनका पूर्व नाम था काशीनाथ मालवीय। मिशन के पत्र 'समन्वय' का संपादन-कार्य निराला जी के बाद उन्हे ही सौंपा गया था। मालवीय जी उनके पुराने मित्रों मे से एक हैं। उनके कथनानुसार, महिपादल की एक विधवा रानी थी। उनका पुत्र बहुत पहले ही मर चुका था। एक दिन एक सन्यासी आया और कहने लगा कि घबराओ मत, तुम्हारा पुत्र नए रूप में तुम्हे अवश्य मिलेगा। उसका पुनर्जन्म हो चुका है, और वह तुम्हारे पास आएगा। इसके कुछ काल बाद ही एक सन्यामी नवयुवक महिपादल पहुँचा। रानी को यह विश्वाम हो गया कि वही उनका पुनर्जन्म प्राप्त पुत्र है। उन्होने आदरपूर्वक उसे वही रोक लिया, और गद्दी पर बिठाया। वह कान्यकुब्ज ब्राह्मण था, इसलिए उसके राजा होने पर अनेक कलौंजिया ब्राह्मण वहाँ आकर बस गए।
सरसो स्वर्ग की लक्ष्मी की तरह खेतों में अंतरिक्ष से अंतरिक्ष तक छाई हुई थी। दाएँ-बाएँ जिधर भी दृष्टि घूमती सरसो का पीलापन मन को वाघ लेता था।
हम लोग नहर के दाहिनी ओर मुड़े। पेड़ो के झुरमुट के पार मंदिर का कलश चमक रहा था। यही गढ़ाकोला था। मन में एक कुरकुरी-सी दौड़ गई। ग्राम गढ़ाकोला, पोस्ट चमियानी, ज़िला उन्नाव को निराला जी अपनी कहानी 'चतुरी चमार' में सदा के लिए अमर कर चुके हैं। सब तो यह है कि गढ़ाकोला मेरे मन में निराला जी ने गाँव से अधिक चतुरी चमार के गाँव के रूप में बना हुआ है। यहाँ आते ही 'कानिका नाऊ' और 'चतुरी चमार' की याद आने लगी।
कलाकार का बड़प्पन इसी में है कि उससे अधिक पाठकों को उसके पात्रों की याद आए।
मुझे अच्छी तरह से याद है। 'सुधा' में जब पहली बार चतुरी चमार पटा था तो मेरे मन को एक विचित्र ताज़गी मिली थी। प्रेमचंद के अनेक ग्रामीण और छोटी कौम के पात्र मन को प्रभावित करते थे,—तब भी और अब भी। प्रेमचंद जी के उन पात्रो को पढ़ते समय ऐसा लगता था कि मानो सिनेमा दृश्य में उन्हे देख रहा हूँ। लगता था जैसे चतुरी ऐसे लोग सामने ही खड़े हो। हो सकता है कि मुझपर यह प्रभाव निराला जी की संगत के कारण पड़ा हो। 'देवी', 'चतुरी चमार', 'मुकुल की बीवी', 'कुल्ली भाट', 'राजा साहब को ठेंगा दिखाया' आदि निराला जी की ऐसी रचनाएँ है जिन्हें पटत समय यह नहीं लगता कि हम कोई गढ़ा हुआ क़िस्सा पढ़ रहे हैं। लेखक इन रचनाओं में अपनेपन का स्पर्श देता है। ये कहानियाँ अथवा रेखाचित्र दरअसल संस्मरण के रूप में ही अधिक उभरकर चाते है।
खेत पृष्ठभूमि मे छूट गए। बसती आने लगी। मिट्टी के कच्चे घर, उनमें भी अधिकांश सण्डहर, गलियाँ बीच में धसी और गड्डों से भरी हुई, घरो के सामने कई जगह मच्छरों के गुच्छों से बाच्छादित नावदान, कहीं गाए, कहीं बैल और कुत्ते।
गलियो मे चक्कर लगाते हुए हम एक मकान के सामने आ खड़े हुए। पुरानी नक़्क़ाशी वाले द्वार पर एक काग़ज़ चिपका था। उस पर लिखा था 'महाप्राण निराला स्मारक भवन'। मैंने बिहारीलाल जी में कहा, घबराइएगा मत। आपका यह काग़ज़ संगमर्मर से अधिक टिकाऊ सिद्ध होगा।
वह बेचारे कुछ समझे नहीं, झेंपकर बोले क्या करें पडित जी, अपने मन का हौसला पूरा कर लिया। नहीं तो जौन आप संगमरमर ने पत्थर की बात कर रहे हैं, वहै हमरेउ मन मा रही। आज तो निराला काका सबके हैं पर एक दिन रहा जब निराला मात्रा हमरेहे-हमरेहे रहे। इनफ्लुइजा मे हमारे बाप-महतारी मर गए। हम नान्ह-नान्ह रहे। निराला काका चक्कीवी पीसें, हमका बनाय में ख़वाबै, हमका पालै। रामकेसन होरे तौ उलमऊ मा रहत रहें नाना के हिह्या, औ निराला काका हमरे पास रहै। काकी। हमारी गुज़र गई रहें तो इन्हें ब्याह के लिए बहुत लोग घेरै, बहुत दखुआ आवै।
एक वाजपेई जी रह। उड़ आए औ कहै लगे, 'महाराज, आपकी कुंडली मा दूसर बिहाब लिया है।' काका कहिन, 'अरे जब हमहे न करव तो कहा ते होई। हमरे चार लरिका ई आय औ रामकेसन औ विटेवा आय। हम इनही का नहीं पाल सकवि हयि। तुम हमका ब्याह करै के लिए कहत हो।'
अपनी जन्मपत्री के ग्रह-नक्षत्रा को निराला जी ही पछाड सकते थे। अनेक लोगों ने अनेक बार उनकी कुंडली देखकर बतलाया कि दूसरा विवाह लिखा है, पर जन निराला जी ही नही करना चाहते थे तो ग्रह-नक्षत्रों की हस्ती ही क्या थी जो उनका विवाह करवा सकते। एक बार जब उनकी बेटी सरोज से उनकी जन्मपत्री फट गई तो निराला जी उसे गंगा जी में प्रवाहित कर आए। कहा, न रहेगा यास, और न बजेगी बाँसुरी।
घर के आगे दाहिनी ओर पर एक छोटी-सी खुली ज़मीन थी। वहा शामियाना लगा या, तखत पढ़े थे। तखत पर एक चौकी और चौकी पर एक लोहे की कुर्सी रखी हुई थी। मैंने बिहारीलाल जी से लखनऊ में वहाँ था कि निराला जी या चित्र ले आऊँगा। अनेक वर्षों पहले मेरे छोटे भाई प्रख्यात चित्रकार मदन लाल नागर ने प्रयाग जाकर निराला जी का एक छोटा तैल चित्र बनाया था। उसने आधार पर फिर एक बड़ा तैल चिन भी उसने बनाया जो अब लखनऊ महापालिका के मग्रहालय में सुरक्षित है।
छोटा चित्र अनेक वर्ष हुए निराला जयंती के अवसर पर एक कवि महोदय मुझसे माँगकर ले गए थे। फिर उन्होंने उसे लौटाया ही नहीं। मैंने बिहारीलाल जी को वही चित्र ला देने का वचन दिया था। कवि बंधु के यहाँ से चित्र तो ग़ैर मैंने किसी तरह मँगवा लिया, पर राम जाने उन्होंने उसे कहा सीलन-पानी म डाल रखा था कि तस्वीर पूरी तौर पर नष्ट हो गई थी।
बिहारीलाल जी ने उसी चित्र की आशा मे यह सिंहासन सजाकर रखा था। पर अब क्या हो। एक सज्जन बोले, 'धर्मयुग में निराला जी का चित्र है। उसे ही काटकर किसी लकड़ी के तख्ते पर चिपका दिया जाए।
'धर्मयुग' का अंक आया। किसी विद्यार्थी की पट्टी आई। किसी ने किसी को लेई बनान का हुकुम दिया। मैंने कहा, उसकी आवश्यकता नहीं। धर्मयुग, से चित्र को फाड़ने की आवश्यकता नही, डोरी ले आइए। सर के फूल ले आइए। काम बन जाएगा।
मैंने पट्टी पर धर्मयुग के पन्ने उलटकर वह चित्र बाधा, सरसों के फूल चारो ओर से इस तरह से खोसे कि उनका फ्रेम बन गया। गेंदे के फूल भी आ गए। उन्हे बीचों-बीच में सजाया। ऐसी शोभा आ गई कि क्या कहूँ।
बिहारीलाल जी ने अपनी शक्ति-भर बड़ा आयोजन किया था। आस-पास के गाँवो में लोगो को न्यौता भिजवाया था। झइयम-झइयम बाजा भी मँगवाया था। ऐसा लगता था कि जैसे रामसहाय त्रिपाठी के घर आज हो सूर्य-कुमार का जन्म हुआ हो। मगरायर ग्राम के एक युवक ने कहा भी कि आज निराला जी की पहली जन्मगाँठ है। एक तरह से यह भी सच था। उनके गाँव मैं उनका यह पहला ही जन्मोत्सव मनाया जा रहा था। निराला जी पैदा बँगाल में हुए, इसलिए उनके जन्मोपलक्ष्य में जो कुछ भी ख़ुशियाली हुई होगी, बह महिपादल मे हो।
शामियाने के नीचे, बल्कि यो बहू कि उसके बाहर एवं पुरुष बैठे थे। किसी ने बताया कि वे चतुरी के भतीजे भगवानदाम है। उनकी आयु वकौल उनके पाच ऊपर सत्तर थी। मैंने पूछा, पंडित जी जब पहली बार बँगाल से गाँव आए तो उनकी क्या उमर थी?
भगवानदास बोले, कनिया माँ रहे, तब दुई एक दाई आए रहैं। बाक़ी त्यारा-चौदा बरस के रहे तब उड़ हिह्या आए। बारा-बारा 'ग्याद' खेले। इस पर महावीर नाम के एक सज्जन बोले, गोली दिन-दिन भर स्यालै। वे पाँचो उंगलियो से अलग-अलग गोली मार लेते थे।
भगवानदाम जी का भाव उमठ रहा था। कहने लगे, पंडित जी, हम पचन ना इतना मांत रहें कि अपने परिवरहन न माने और फिर जब उइ बड़े हुइगे हिया आवै तौ हम पचै उनका छाडि के चौर कौनो काम नही किहिन। कुश्ती लड़ावै का बहुत मौक़ा रहा। सबका एक-एक लगोटा बनवाइन।
राष्ट्रीय आंदोलन में निराला जी ने अपने गाय के ज़मींदार के अत्या चारो के विरुद्ध बहुत बडा आंदोलन चलाया। थी गया प्रसाद, श्री भगवानदास, श्री महावीर एवं में एक बात जोड़कर सुनाने लगे: मिटिन होत रहै। एक मोटिन निराला जी कराइन, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' आए रहे। देविन के पास तबू गाड़ि के मीटिन भै। बहू ज़माने भर लगान अदाई तो हौति न रहै, तौन रैयतु मारी-पीटी जाए, वही ज़माना मा दुई-चार पिटवाएँगे, तौन निराला जी रिसाएँगे, किसान संगठन कराइन पूरे गाँव ज़मीनो का इस्तीफ़ा कराय दिया—दुई-चार लोग चाहे न किहिन होय बाक़ी सब किहिन। साल-भर ज़मीन परती पड़ी रही।
निराला जी के आंदालनकारी रूप की कल्पना तो मैं सहज ही कर सकता था। चतुरी चमार में उन्होंने उन दिनों का ब्यौरा दिया है। अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाए बिना—निराला जी रह ही नही सकते थे।
सरोज के विवाह की निराली कथा भी सुनी। पंडित गया प्रसाद जी गाँव के उन व्यक्तियों में से हैं जिन्ह, निराला जी अपना मित्र मानते थे। उन्होंने बतलाया, सरोज के वर (शिवशेखर जी) गाँव में ही मौजूद थे। निराला जी ने अपनी बेटी का विवाह उन्ही से कर देने का निश्चय मन ही मन कर लिया था। एक दिन सबेरे हम ते कहिन कि चलौ गया परसाद कानपुर। सामान लाना है। आज हमारे हिया बरात आई। कानपुर ते फल धोती सब समान लाए। गूलर की डाल गाड़ी गई। मगरायर ते नंद दुलारे वाजपेई आए, राधारमन आए। निराला जी पंडित का बुलाइन। कहा, 'मंत्र पढ़ौ। सरोज केर सादी आए।'
पंडित बोले, 'ऐसे कैसे साथी होइ है?
निराला जी बोले, 'तुम्हें क्या मालूम, कितने प्रकार के विवाह होते हैं। जैसा मैं कहूँ वैसा करो।'
बस विहाव होइगा।
अवधी के एक तरण कवि सूरजप्रसाद द्विवेदी निराला जी द्वारा बीघापुर स्टेशन पर लालमणि जी को थाल भर बर्फ़ी खिलाने का क़िस्सा सुनाने लगे। बोले, यह बात मैंने लालमणि जी से गुनी थी और इसपर मैंने एक कौवाली भी लिखी है।
कव्वाली का नाम सुन हमें मज़ा या गया। सुनाने के लिए कहा। सूरज-प्रसाद जी सुनाने लगे।
आज बर्फ़ी मिले साऊँ
तो मज़ा आ जाए।
और चाकू से छिलाऊँ
तो मज़ा आ जाए।
दोस्तो सुन लो ये क़िस्सा बड़ा पुराना है।
महाकविराज निराला को जगत माना है।
गढ़ाकोला मे जन्मभूमि काव्य माना है।
रहे प्रयाग तीर्थराज मन लुभाना है।
वही दृष्टांत सुनाऊँ तो मज़ा आ जाए।
आज बर्फ़ी मिले, खाऊँ
तो मज़ा था आए!
आ रही गाड़ी बरेली से चली बीघापुर,
खटाखट बाँट रहे थे टिकट खड़े मायुर।
प्लेटफ़ार्म में शोर गुल मचा जैसे दादुर,
दो युवक कर रहे थे बातचीत प्रेमातुर।
मित्रवर मन की बताऊं तो मज़ा था जाए।
आज बर्फ़ी जो खाऊँ
तो मज़ा आ जाए!
सुना बातों को निराला जी मुस्कुराए हैं।
दबे पाँवो ही यहाँ से तुरंत सिधाए है
उठा दूकान से बर्फ़ी का थाल लाए हैं
सामने लाके रखा मृदुवचन सुनाए हैं।
अजी बैठो में खिलाऊँ तो मज़ा आ जाए।
आज बर्फ़ी जो खाऊँ
तो मज़ा था जाए।
देख लीला को निराला की वह लजाए हैं,
चकित होके चरण कमलो में सर झुकाए है।
हठ थाल में ही बर्फ़ियाँ खिलाए हैं
लौटा के हुए दाम जो चुकाए हैं।
म 'सूरज' जो बढ़ाऊँ तो मज़ा आ जाए।
आज बर्फ़ी जो खाऊँ
तो मज़ा था जाए।
मगरायर के श्री रेवती शंकर शुक्ल ने निराला जी के पहलवानी के क़िस्से सुनाए। उन्होंने बताया कि गढ़ाकोला में एक रईस रहा करते थे। निराला जी से उनकी बड़ी मैत्री थी। उन्हीं की प्रेरणा से चौरसिया जी ने मगरायर में वीणावाणि पुस्तकालय की स्थापना भी की। पंडित नंददुलारे वाजपेयी भी मगरायर ग्राम के निवासी है। निराला जी तथा उनके पिता चौरसिया जी से मिलने के लिए अवसर वहा जाया करते थे। उन दिनों निराला जी की पहलवान बनने का बड़ा जोम था। ख़ूब कसरत करते वे और बदन बनाते थे। एक दिन चौरसिया जी से बोले, बाबूजी, कोई जोड़ नही मिलती।
चौरसिया जी बोले, घबराओ मत। परागी पहलवान को बुलवाया है।
कही बाहर का रहने वाला है?
नहीं, है तो यही का, पर आजकल बाहर गया हुआ है।
तो उसे झट-पट बुलवाइए।
उसके बाद से निराला जी परागी पहलवान से कुश्ती लड़ने के लिए आतुर रहने लगे। एक दिन चौरसिया जी ने बताया कि परागी आ गया है। निराला जी माशूक की तरह परागी पहलवान से मिलने के लिए बेचैन हो गए। चौरसिया जो ने कहा कि परागी घोबियँ की गली में रहता है। निराला जी को भला सब कहा। पता पूछते हुए वहाँ पहुँच गए! कुंडी खटखटाई। पहलवान बाहर आए। निराला जी उन्हें देखते रहे। फिर पूछा : आप हो परागी पहलवान हैं?
वे बोले, हा।
बस, फिर बिना कुछ कहे-सुने ही वहाँ से चले आए। चौरसिया जी से मिले। बोले, आपके परागी को अभी देखकर चला आ रहा हूँ।
चौरसिया जी ने पूछा, है बराबर की जोड़ कि नहीं?
अजी वो क्या लड़ेगा मुझसे? मुझे मालूम हो गया, यहाँ कोई मेरी जोड़ का पहलवान नहीं है।
चौरसिया जी बोले, ख़ैर पंडित जी, कुछ हरज़ा नहीं। कल लड़ तो लेना ही उससे, और कुछ नहीं तो उसका हौसला ही वह जाएगा।
निराला जी ने भगनभन 'हा' कह दिया। दूसरे दिन रुस्तमेहिन्द बने हुए झूमते-झूमते अखाड़े में पहुँच गए। परागी ने एक-एक करके उन्हें चार बार पटकनी दी। दूसरे ही दिन एक मटकी घी लेकर निराला जी परागी पहलवान के यहाँ पहुँचे। बोले, पहलवान ख़ूब लड़ते ही। य लो, घी खायो।
उसके बाद परागी पहलवान से निराला जी की बड़ी दोस्ती हो गई। परागी के अलावा उस क्षेत्र में दुलारे काछी का भी पहलवानी मे बड़ा नाम था। एक बार निराला जी के हौसले और चौरसिया जी के पैसे के बल पर उन दोंनो का दंगल कराया गया। दुलारे काछी का बड़ा दबदया था। लेकिन जब परागी ने उसे पछाड़ दिया तो निराला जी ऐसे प्रसन्न हुए मानो उन्होंने ही कुश्ती जीती हो। परागी से बोले, तुम्हें सोने या मेडल दूँगा।
निराला जी और सोने का मेडल होता। मिट्टी का भी देते तो सोने से बढ़कर होता।
मज़मे मे एक् चितचोर जी भी वे—पास ही के राजापुर गढ़ेवा गाँव के रहने वाले। निराला जी के इलाक़े में मुझे अगर चितचोर न मिलते तो मज़ा अधूरा रह जाता। लाखो की हैमियत से कम तो वे बात ही नहीं करते थे, और हाल वडा पतला था। कहने लगे कि 'निराला जी हमसे बहुत कहे रिचितचोर, कविता लिखो, चितचोर कविता लिखो। पर हम कह कि नहीं। फिर अभी हाल ही में हमने सोचा कि निराला जी हमारे वैसबारे के रतन रहे, मित्र रहे, इतना कहते रहे तो लाओ कविता लिखे। फिर क्या था नागर जी, हमने पाँच कविताएँ लिख डाली। आपको पाँचो सुननी पड़ेंगी।
पाँचो कविताएँ चितचोर जी ने कांग्रेस ने विरुद्ध लिखी थी। ठाठ के साथ सुनाई। फिर पूछा, 'बंसी हैं?
अरे...! हमने कहा, ये कविताएँ सुन लेते तो निराला जी फिर कविता लिखना छोड़ देते।
चितचोर जी यह सुनकर बड़े संतुष्ट हुए। बोले, बड़े सेर आदमी रह निराला जी। हमारे वैसवारे के रतम रहे, —रतन ऑफ़ होत इंडिया रह। और तुम समझ लेव नागर जी, कि निराला जी मर तो ज़रूर गए, बाक़ी ये बताओ कि उनकी रूह कहाँ है।
हमने कहाँ, रूहो तक हमारी पहुँच नहीं। यह आप ही बतला सकते हैं।
बोले, 'हाँ, हम ही बतलाय सकते है। उनकी रूह कही नहीं गई। एक तांत्रिक ने उसको पकड़ लिया है।
मीटिंग वा समय हो रहा था। बिहारीलाल जी ने कहा कि भोजन करके उधर ही चला जाए। हम घर के अंदर गए। दरवाज़े से घुसते ही दहलीज़ से एक जगह पुआल का ढेर पड़ा था। बिहारीलाल जी बोले, काका, यहैं बैठि कै लिखत रहे। तकिया छाती के तले दबा लें, और पौडे भर, लिखा करें।
घर के अंदर आँगन की कच्ची चहारदीवारी कई जगह से टूट चुकी थी। बड़ा सस्ता हाल था। पिछवाड़े की तरफ़ चतुरी चमार के घर की दीवाल भी दिखलाई पड़ रही थी। निराला का घर-गाँव सब कुछ जीर्ण-कीर्ण अवस्था में था। इस अति पिछड़े हुए गाँव में कीचड-कादा और टूटे घरो की बस्ती देख-देखकर मेरा मन एक अजीब खिसियान में भरता जा रहा था।
हमारा मिडिल क्लास बाबू निराला को राष्ट्रपति भवन में प्रतिष्ठा दिलाने के लिए मचल रहा है। वह चाहता है कि निराला का सम्मान हो। राष्ट्रीय महापुरुषा में उन्हे समुचित स्थान मिले। राष्ट्रपति, मत्री, प्रधान मंत्री, अमुक् जी, तमुक जी आदि उनके यश गाए। मैं सोचने लगा कि ये वैसी उल्टी अभिलाषा है लोगो की। कैसा निकम्मा उद्योग है उनका। निराला के ठाठ भला यो बन सकते है।
भोजन के बाद जुलूस निकला। लोहे की कुर्सी पर चादर टाक्कर उस पर निराला जी का चित्र रखकर उन्होंने वश का एक युवक उस सिंहासन को अपने मर पर उठाए हुए आगे-आगे चला। पीछे गाँव वालो का हुजूम। घटा-शंख-घड़ियाल की ध्वनि और उसके पीछे चिमटा भाभ-करताल-मजीरे बजाने और गाते हुए चतुरी के भाई विरादरा की भगन मंडली। बीच-बीच में 'बोल दे निराला बाबा की जय' के नारे।
घरों ने औरतें और बच्चे शोर सुनकर बाहर निक्ल पड़े थे। गाँव के लिए इस बार की वसंत पंचमी एकदम नई होकर आई थी। मैं सोचने लगा कि महाकवि ने अपने जीवन-काल में कभी यह कल्पना न की होगी कि उतरे पुरण्यो के गाँव में उनका ऐसा सम्मान होगा।
सन् '38 में निराला जो यहाँ से दुखी होकर गए थे, और फिर कभी न आए। ऊँची जाति के लोगा में दंभ और अशिक्षा का बोलबाला था। ग़रीब जनता बड़ी की लाठी में बुरी तरह अस्त थी। जुलूस में साथ-साथ चलने वाले धमनी खेड़ा के श्री दुर्गाप्रसाद मिश्र और काशीप्रमाद मिश्र दो भाई भी थे। रिश्ते मे निराला जी उनके मामा होते थे। काशीप्रसाद जी कहने लगे, सन् अट्ठावन में हम लोग वसंत पंचमी के दिन निराला जी से मिलने के लिए इलाहाबाद गए। उन्होंने बड़ी उत्सुकता से यहाँ वा एक-एक हाल पूछा। मैंने कहा कि एक बार फिर गाँव चलिए। सुनकर मामा उदास हो गए। बहने लगे कि क्या जाए, वहाँ बड़ी अशिक्षा है। मैंने कहा कि अब गढ़ाकोला और वैमवारा बहुत बदल गया है। वहाँ गाँव-गाँव में स्कूल पाठशाले खुल गए हैं। ज़मीदारी भी ख़त्म हो गई है। किसान अब अपने खेतो के मालिक हो गए हैं।
इसपर महाकवि पूछ बैठे, 'गढ़ाकोला का लगान अब कौन लेता है?
मैंने कहा, 'कुर्क अमीन वसूल करते हैं।'
पूछने लगे, 'कुर्क अमीन किसके आदेश से वसूल करते हैं।'
मैंने वहा, 'सरकार के आदेश से।'
सरकार का नाम सुनते ही न जाने क्या हुआ कि महाकवि ने मुँह फेर लिया, और कुछ बड़बड़ाने लगे।
दुर्गाप्रसाद कह रहे थे, इस बार भादो में हम फिर उनसे मिलने इलाहाबाद गए थे। महाकवि यहाँ का सब हाल-चाल पूछने लग। फिर हमसे कहा, 'गढ़ाकोला जैहो।'
मैंने कहा, 'आप कह तो चले जाई।'
निराला जी बोले, 'हमका कौनों गर्ज है?
उसके बाद हम गढ़ाकोला आए। यहाँ से उनके लिए आम, अमावट, खटाई सब ले गए। निराला जी को अपने बग़ीचे के आम बहुत ही पसंद थे। मैंने एक आम उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा, 'भदैला को आम आय।'
महाकवि देखकर बोले, 'नाही, यो म्याड पर वाले को आय।'
उन्हे अपने बग़ीचे के एक-एक पेड़ के आम की पहचान थी। अंतिम वार उन्होंने अपने गाँव के आम खाए और फिर आम, अमावट और खटाई आदि लेकर अपने पुत्र रामकृष्ण के घर गए।
कच्ची सड़क से जुलूस आगे बढ़ रहा था। अगल-बग़ल दोनों ओर सरसो फूली हुई थी। क्षेत्र के ब्लॉक डेवलपमेंट अफ़सर मेरे पास आए। कहने लगे, ये सड़क जिसपर कि आप चल रहे हैं, इसका नाम निराला मार्ग है। गाँव वाले इसे श्रम-दान से तैयार कर रहे हैं। छह मील की यह सड़क पुरवा में जाकर मिलेगी। फिर वहा से उन्नाव तक यही निराला मार्ग बना दिया जाएगा।
उनकी बात पूरी भी न हो पाई थी कि पंडित बिहारीलाल जी लपकते हुए हमारे पास आए और बाईं ओर का एक खेत दिखलाते हुए बोले, यह खेत रामसहाय बाबा ने निराला काका के नाम से लिया था। काग़ज़ पर सूर्जकुमार नाम चढ़ा है।
जुलूस और आगे बढ़ा। निराला बाना की जय के नारे और शंख घटा-घड़ियालो का नाद इस समय अपने पूरे ज़ोर पर था। किनारे पर पड़ी एक मड़ैया के धागे खड़ा हुआ एक वृद्ध बार-बार अपनी आँखें पोंछने लगा। गढ़ाकोला के एक सज्जन ने बतलाया कि यह पासी निराला जी के पास बहुत आया-जाया वरना था। इसपर हठात् मेरे मन में बात थाई। छोटी कौम कहलाने वाले दबे-पिसे लोग ही निराला जी के नाम पर रोनेवालो में यहाँ अधिक हैं। मैंने छेड़ते हुए पूछा, यहाँ के ऊँची जात वालों में कितने लोग निराला जी के भक्त हैं?
'अरे बहुत कम। ई पचै तो महाश्वी का यादों नहीं कर्तु है।
मैं सोचने लगा कि वे लोग भला निराला को क्यों याद रखें। निराला जी ने उनकी जातिगत उच्चता को कभी स्वीकार नहीं किया। उनके झूठे धर्म को सदा लातो से ठुकराया। ग़रीब-मजलूमो की आवाज़ मुनी। उनके लिए ताक़तवरा से जूझे। उनके सुख-दुख में शामिल हुए, यही वजह है जो यह इतनी बड़ी भगत-मंडली इस जुलूस में ऊँची जात वालो की संख्या को मात देती हुई आगे बढ़ रही है। मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था। शिव अपने भूतगणो वे मान हरी शोभित होते हैं।
निराला बाग़ आ गया। यह उनके पुरखों का बाग़ है। कुनवे वाला ने चितचोर गंभीर हो गए। फिर बोले, अच्छा तौ—या तौ एक रुपया हमें देव या हममे लेव।
चितचोर जी के कहने की अदा मुझे बड़ी भावी।
भाषण पर भाषण होते रहे। माइक्रोफ़ोन था नहीं और आजकल आमतौर पर हमारे पढ़े लिखे लोगो के पास वह आवाज़ नही रह गई जो दम-बीस हज़ार की कौन बहे, हज़ार-पाँच सौ आदमियो वो भी सुनाई पड़ सके। जनता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। जवान लड़किया, औरतें, बच्चे, पुरुष नमग बढ़ते ही जा रहे थे। होने वाले तमागे, यानी कि भाषणबाज़ी के प्रति उनमे सहज आकर्षण था। लेकिन बातें बुद्ध तो सुनाई न पड़ती थी, और कुछ समझ में न आती थी। इमलिए बढ़ती भीड़ में शोरगुल भी क्रमश बढ़ता ही जाता था।
मुझे लगा कि इस मेले को एक सुनियोजित रूप देना चाहिए—स्मरत—कुश्ती वा दगल, औरतो की बनाई हुई गृह शिल्प की वस्तुओं वा प्रदर्शन, क्षेत्रीय कवियों का सम्मेलन, खेल-कूद और वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ, यहाँ प्रतिवर्ष हुआ करें तो बहुत अच्छा हो।
vasant panchmi ke avsar par prayag gaya tha. nirala ji kathin bimari bhogkar uthe the, socha ki is varsh unke saath hi unki jayanti mana loon. agle varsh ye avsar aaye ki na aaye. nirala ji durbal hone par bhi svasth the, khoob magn the. laug pair chhukar unhen haar pahnana chahte the aur naumra unki daDhi banate hue apna mahattv jatlakar apne apne haro ko nirala ji ke charno par rakhne ke liye achchhi achchhi ko baDi shaan se adesh de raha tha.
is baar phir vasant panchmi ai—nirala ji ke nidhan ke baad pahli vasant panchmi. patr patrikaon ne visheshank nikale, jagah jagah nirala parishdo ka udghatan kiya gaya, baDe ho halle hue. marne ke baad dilli ke rashtrapti bhavan mein bhi nirala ji ki aarti utari gai.
vasant panchmi se chhः saat din pahle gaDhakola gram se nirala ji ke bhatije shri biharilal tripathi aur unke anya do chaar sage sambandhi mere yahan aaye. ve log gaDhakola mein nirala jayanti manana chahte the, aur is ghair tevar ke saath aaye the ki laat sahab ko vahan le chala jaye. unme se ek bandhu to apne bholepan mein puri skeem bakhan ge. bole, hamne pahle vichar kiya ki sidhe laat sahya ke paas chalen. nirala ji ke naam par na to ve kar hi nahi sakte, aur karte bhi to hum kahte ki hum panno mein apaki alochana karenge. apni alochana se to sabhi ghabrate hai, so wo razi ho jate.
mujhe laga ki ye log nire bholepan mein apni ahta ko tusht karne ke liye nirala ji rupi lathi ke dvara baDe baDo ko hakkar apne gharib guman ke baaD mein band kar lena chahte hai.
biharilal ji ne adhik samajhdari ki baten ki. kahne lage, nirala kaka hamare bhi to the. hum log gharib hai, par yathashakti apne yahan bhi nirala kaka ka utsav manana chahte hai. aap jaisa kahge, vaisa karenge.
mainne kaha, is saal to kisi bhavya ayojan ke liye samay nahin raha. aap log sidhe sade Dhang se nirala jayanti mana len. agle varsh koi baDa ayojan kijiyega.
ve log is baat par razi ho ge. tay hua ki main vasant panchmi ke din subah pahli bas se purva pahunch jaun. vahan se ve log mujhe gaDhakola le jayenge.
subah saDhe aath nau tak bas purva pahunch gai. chunav ke din the hi. bas ke aDDe ke paas hi halvaiyon ki dukanon ke alava kangres aur jansangh ki chunav dukanen bhi suni hui thi. laal, pili, safed topiyan nazar aa rahi thi. lauDaspikar par ya kahani hai diye ki aur tufan ko, nirbal mae laDai balvan wo vala filmi rikarD baDe zor shor se baj raha tha.
hum bas se utre. yahan sab kuch tha, magar gaDhakola parti ke log vahi nahin dikhlai paDe. aadh ghante ke baad akhir biharilal ji do anya vyaktiyan ke saath saikilo par aa pahunche. unhen dekhkar jaan mein jaan aai. tabhi ek dusri samamya upasthit hui. biharilal ji ne kisi se bailgaDi ka prbandh diya tha. ain samay par laDhapati ne lata dene se inkaar kar diya. purva mein do teen Dakke to avashya saDe the. par ve chunav ke dinon mein ek khadidhari netanuma vyakti wo gaDhakola le jane ke liye paanch rupe maang rahe the.
biharilal ji baDe shashopaj mein paDe.
main svayan bhi thoDe rupe lekar hi ghar se chala tha. isliye ek aur ke paanch rupe ret par razi na hua.
ab kya kiya jaye. samne teen saikilen hi nazar aa rahi thi.
saikil chalana mein vajiv hi vajiv janna hu. tees paintis saal pahle apne saikildhari mitro ke dabav se mainne ye kartab sikha tha. un dinon main bahut mota tha. isliye saikil aisi mavari mujhe napsand thi. keval doston ke saath sair karne ke liye kabhi kabhi majburan uska prayog karna pahna tha. kisi phutpath ve sahare saikil par savar hokar jaya karta. jab utarna hota to saikil wo bhukakar utar paDta. san 37 mein ek baar mein saikil se gaDabDakar taza koltar paDi hui saDak par gir paDa tha. tab se phir kabhi saikil par chaDhne ka naam tab na liya.
lekin yahan saikli mein alava aur koi sadhan hi nazar na aaya. socha ki bajrang bali ka naam lekar ab isipar chaDha jaye. jo hoga so dekha jayega.
ek jagah taang uchhalne bhar ka ek zara uncha sa mitti ya Dhooh tha, uske sahare saikil par savar ho gaya. yachchi baluha saDak par nahr ke kinare kinare hum chal paDe. raste bhar manate chale ja rahe the ki he raam ji, kahin ladd se gir na paDen jisse hamari hami uDe.
gaanv ab aadh paun meel hi door rah gaya tha. tabhi ek aur vikt samamya aai. samne chhः saat bailgaDiya env pankti mein chali ja rahi thi. sochne laga inse bachkar kaise niklunga. sathi bhi shayad meri paristhiti ko samajh ge. aage baDhkar saDhevalo ko ek or ho jane ke liye huDdang machane lage. par vahan jagah hi na thi. main utar paDa. un longo se kaha, aap log chaliye. hum aur biharilal ji paidal aate hain.
apni saikil mujhe de dene ke karan biharilal ji evan saikil ke kairiyar par baithkar aa rahe the. isse unki bhi haDDi pasaliyan yaal hui thi.
pulim mein unhen naukari mil gai. hote karte zamadar ho ge. phir hua laat saheb ke man chaDh ge aur unki aradli mae chale ge. laat saheb hamesha ramamhay baba ko apne saath saath rakhe. to ek baar mahipadal mahraj ke hiya laat saheb ge. mahipadal mahraj ne ramamhay baba ko dekha to laat saheb mein kaha ki inhe hamein de dijiye, hamare yahan aisa koi zamadar nahin hai. laat saheb ne unhen de diya. ramashay baba mahipadal mein rahne lage. phir saan bhar baad ramlal baba bhi vahi chale ge.
bangal ki mahipadal stet mein kanyakubj brahmnon ke pahunchne ki evan kya main lakhanuu mein bhi sun chuka tha. yahan ramkrishn mishan mein ek sanyasi rahne the. unka poorv naam tha kashinath malaviy. mishan ke patr samanvay ka sampadan karya nirala ji ke baad unhe hi saumpa gaya tha. malaviy ji unke purane mitron mae se ek hain. unke kathnanusar, mahipadal ki ek vidhva rani thi. unka putr bahut pahle hi mar chuka tha. ek din ek sanyasi aaya aur kahne laga ki ghabrao mat, tumhara putr ne roop mein tumhe avashya milega. uska punarjanm ho chuka hai, aur wo tumhare paas ayega. iske kuch kaal baad hi ek sanyami navyuvak mahipadal pahuncha. rani ko ye vishvam ho gaya ki vahi unka punarjanm praapt putr hai. unhone adarpurvak use vahi rok liya, aur gaddi par bithaya. wo kanyakubj brahman tha, isliye uske raja hone par anek kalaunjiya brahman vahan aakar bas ge.
sarso svarg ki lakshmi ki tarah kheto mein antriksh se antriksh tak chhai hui thi. dayen bayen jidhar bhi drishti ghumti sarso ka pilapan man ko vaagh leta tha.
hum log nahr ke dahini or muDe. peDo ke jhurmut ke paar mandir ka kalash chamak raha tha. yahi gaDhakola tha. man mein ek kurkuri si dauD gai. gram gaDhakola, post chamiyani, zila unnaav ko nirala ji apni kahani chaturi chamar mein sada ke liye amar kar chuke hain. sab to ye hai ki gaDhakola mere man mein nirala ji ne gaanv se adhik chaturi chamar ke gaanv ke roop mein bana hua hai. yahan aate hi kanika nau aur chaturi chamar ki yaad aane lagi.
kalakar ka baDappan isi mein hai ki usse adhik pathko ko uske patro ki yaad aaye.
mujhe achchhi tarah se yaad hai. sudha mein jab pahli baar chaturi chamar pata tha to mere man ko ek vichitr tazgi mili thi. premchand ke anek gramin aur chhoti kaum ke paatr man ko prabhavit karte the, —tab bhi aur ab bhi. premchand ji ke un patro ko paDhte samay aisa lagta tha ki mano sinema drishya mein unhe dekh raha hoon. lagta tha jaise chaturi aise log samne hi khaDe ho. ho sakta hai ki mujhpar ye prabhav nirala ji ki sangat ke karan paDa ho. devi, chaturi chamar, mukul ki bivi, kulli bhaat, raja sahab ko thenga dikhaya aadi nirala ji ki aisi rachnayen hai jinhen patat samay ye nahin lagta ki hum koi gaDha hua qissa paDh rahe hain. lekhak in rachnaon mein apnepan ka sparsh deta hai. ye kahaniyan athva rekhachitr darasal sansmran ke roop mein hi adhik ubharkar chate hai.
khet prishthabhumi mae chhoot ge. basti aane lagi. mitti ke kachche ghar, unmen bhi adhikansh sanDhar, galiyan beech mein dhasi aur gaDDon se bhari hui, gharo ke samne kai jagah machchhron ke guchchhon se bachchhadit navadan, kahin gaye, kahin bail aur kutte.
galiyo mae chakkar lagate hue hum ek makan ke samne aa khaDe hue. purani naqqashi vale dvaar par ek kaghaz chipka tha. uspar likha tha mahapran nirala smarak bhavan. mainne biharilal ji mein kaha, ghabraiyega mat. aapka ye kaghaz sangmarmar se adhik tikau siddh hoga.
wo bechare kuch samjhe nahin, jhempkar bole kya karen paDit ji, apne man ka hausla pura kar liya. nahin to jaun aap sangmarmar ne patthar ki baat kar rahe hain, vahai hamreu man ma rahi. aaj to nirala kaka sabke hain par ek din raha jab nirala matra hamrehe hamrehe rahe. inaphluija mae hamare baap mahtari mar ge. hum naanh naanh rahe. nirala kaka chakkivi pisen, hamka banay mein khavabai, hamka palai. ramkesan hore tau ulamuu ma raht rahen nana ke hihya, au nirala kaka hamre paas rahai. kaki. hamari guzar gai rahen to inhen byaah ke liye bahut log gherai, bahut dakhua aavai.
ek vajapei ji rah. uD aaye au kahai lage, maharaj, apaki kunDli ma dusar bihab liya hai. kaka kahin, are jab hamhe na karav to kaha te hoi. hamre chaar larika ii aay au ramkesan au viteva aay. hum inhi ka nahin paal sakavi hayi. tum hamka byaah karai ke liye kahat ho.
apni janmapatri ke grah nakshatra ko nirala ji hi pachhaD sakte the. anek logo ne anek baar unki kunDli dekhkar batlaya ki dusra vivah likha hai, par jan nirala ji hi nahi karna chahte the to grah nakshatron ki hasti hi kya thi jo unka vivah karva sakte. ek baar jab unki beti saroj se unki janmapatri phat gai to nirala ji use ganga ji mein prvahit kar aaye. kaha, na rahega yaas, aur na bajegi bansuri.
ghar ke aage dahini or par ek chhoti si khuli zamin thi. vaha shamiyana laga ya, takhat paDhe the. takhat par ek chauki aur chauki par ek lohe ki kursi rakhi hui thi. mainne biharilal ji se lakhanuu mein vahan tha ki nirala ji ya chitr le auunga. anek varshon pahle mere chhote bhai prakhyat chitrkar madan laal nagar ne prayag jakar nirala ji ka ek chhota tail chitr banaya tha. usne adhar par phir ek baDa tail chin bhi usne banaya jo ab lakhanuu mahapalika ke magrhalay mein surakshit hai.
chhota chitr anek varsh hue nirala jayanti ke avsar par ek kavi mahoday mujhse mangakar le ge the. phir unhonne use lautaya hi nahin. mainne biharilal ji ko vahi chitr la dene ka vachan diya tha. kavi bandhu ke yahan se chitr to ghair mainne kisi tarah mangva liya, par raam jane unhonne use kaha silan pani ma Daal rakha tha ki tasvir puri taur par nasht ho gai thi.
biharilal ji ne usi chitr ki aasha mae ye sinhasan sajakar rakha tha. par ab kya ho. ek sajjan bole, dharmyug mein nirala ji ka chitr hai. use hi katkar kisi lakDi ke takhte par chipka diya jaye.
dharmyug ka ank aaya. kisi vidyarthi ki patti aai. kisi ne kisi ko lei banan ka hukum diya. mainne kaha, uski avashyakta nahin. dharmyug, se chitr ko phaDne ki avashyakta nahi, Dori le aaie. sar ke phool le aaie. kaam ban jayega.
mainne patti par dharmyug ke panne ulatkar wo chitr badha, sarson ke phool charo or se is tarah se khose ki unka phrem ban gaya. gende ke phool bhi aa ge. unhe bichon beech mein sajaya. aisi shobha aa gai ki kya kahun.
biharilal ji ne apni shakti bhar baDa ayojan kiya tha. aas paas ke ganvo mein logo ko nyauta bhijvaya tha. jhaiyam jhaiyam baja bhi mangvaya tha. aisa lagta tha ki jaise ramashay tripathi ke ghar aaj ho surya kumar ka janm hua ho. magrayar gram ke ek yuvak ne kaha bhi ki aaj nirala ji ki pahli janmganth hai. ek tarah se ye bhi sach tha. unke gaanv main unka ye pahla hi janmotsav manaya ja raha tha. nirala ji paida bangal mein hue, isliye unke janmoplakshya mein jo kuch bhi khushiyali hui hogi, bah mahipadal mae ho.
shamiyane ke niche, balki yo bahu ki uske bahar evan purush baithe the. kisi ne bataya ki ve chaturi ke bhatije bhagvandam hai. unki aayu vakaul unke paach uupar sattar thi. mainne puchha, panDit ji jab pahli baar bangal se gaanv aaye to unki kya umar thee?
bhagvandas bole, kaniya maan rahe, tab dui ek dai aaye rahain. baqi tyara chauda baras ke rahe tab uD hihya aaye. bara bara gyaad khele. is par mahavir naam ke ek sajjan bole, goli din din bhar syalai. ve pancho ungaliyo se alag alag goli maar lete the.
bhagvandam ji ka bhaav umath raha tha. kahne lage, panDit ji, hum pachan na itna maant rahen ki apne parivarhan na mane aur phir jab ui baDe huige hiya aavai tau hum pachai unka chhaDi ke chaur kauno kaam nahi kihin. kushti laDavai ka bahut mauqa raha. sabka ek ek lagota banvain.
rashtriy andolan mein nirala ji ne apne gaay ke zamindar ke atya charo ke viruddh bahut baDa andolan chalaya. thi gaya parsad, shri bhagvandas, shri mahavir evan mein ek baat joDkar sunane lageh mitin hot rahai. ek motin nirala ji karain, balkrishn sharma navin aaye rahe. devin ke paas tabu gaDi ke mitin bhai. bahu zamane bhar lagan adai to hauti na rahai, taun raiyatu mari piti jaye, vahi zamana ma dui chaar pitvayenge, taun nirala ji risayenge, kisan sangthan karain pure gaanv zamino ka istifa karay diya—dui chaar log chahe na kihin hoy baqi sab kihin. saal bhar zamin parti paDi rahi.
nirala ji ke andalankari roop ki kalpana to main sahj hi kar sakta tha. chaturi chamar mein unhonne un dinon ka byaura diya hai. anyay ke viruddh apni avaz uthaye bina—nirala ji rah hi nahi sakte the.
saroj ke vivah ki nirali katha bhi suni. panDit gaya parsad ji gaanv ke un vyaktiyon mein se hain jinh, nirala ji apna mitr mante the. unhonne batlaya, saroj ke var (shivshekhar jee) gaanv mein hi maujud the. nirala ji ne apni beti ka vivah unhi se kar dene ka nishchay man hi man kar liya tha. ek din sabere hum te kahin ki chalau gaya parsad kanpur. saman lana hai. aaj hamare hiya barat aai. kanpur te phal dhoti sab saman laye. gular ki Daal gaDi gai. magrayar te nand dulare vajapei aaye, radharman aaye. nirala ji panDit ka bulain. kaha, mantr paDhau. saroj ker sadi aaye.
panDit bole, aise kaise sathi hoi hai?
nirala ji bole, tumhen kya malum, kitne prakar ke vivah hote hain. jaisa main kahun vaisa karo.
bas vihav hoiga.
avadhi ke ek taran kavi surjaprsad dvivedi nirala ji dvara bighapur steshan par lalamani ji ko thaal bhar barfi khilane ka qissa sunane lage. bole, yah baat mainne lalamani ji se guni thi aur ispar mainne ek kauvali bhi likhi hai.
kavvali ka naam sun hamein maza ya gaya. sunane ke liye kaha. suraj parsad ji sunane lage.
aaj barfi mile saun
to maza aa jaye.
aur chaku se chhilaun
to maza aa jaye.
dosto sun lo ye qissa baDa purana hai.
mahakaviraj nirala ko jagat mana hai.
gaDhakola mae janmabhumi kavya mana hai.
rahe prayag tirthraj man lubhana hai.
vahi drishtant sunaun to maza aa jaye.
aaj barfi mile, khaun
to maza tha aaye!
aa rahi gaDi bareli se chali bighapur,
khatakhat baant rahe the tikat khaDe mayur.
pletfarm mein shor gul macha jaise dadur,
do yuvak kar rahe the batachit prematur.
mitravar man ki bataun to maza tha jaye.
aaj barfi jo khaun
to maza aa jaye!
suna baton ko nirala ji muskuraye hain.
dabe panvo hi yahan se turant sidhaye hai
utha dukan se barfi ka thaal laye hain
samne lake rakha mriduvchan sunaye hain.
aji baitho mein khilaun to maza aa jaye.
aaj barfi jo khaun
to maza tha jaye.
dekh lila ko nirala ki wo lajaye hain,
chakit hoke charan kamlo mein sar jhukaye hai.
hath thaal mein hi barfiyan khilaye hain
lauta ke hue daam jo chukaye hain.
ma suraj jo baDhaun to maza aa jaye.
aaj barfi jo khaun
to maza tha jaye.
magrayar ke shri revati shankar shukl ne nirala ji ke pahalvani ke qisse sunaye. unhonne bataya ki gaDhakola mein ek rais raha karte the. nirala ji se unki baDi maitri thi. unhin ki prerna se chaurasiya ji ne magrayar mein vinavani pustakalaya ki sthapana bhi ki. panDit nandadulare vajapeyi bhi magrayar gram ke nivasi hai. nirala ji tatha unke pita chaurasiya ji se milne ke liye avsar vaha jaya karte the. un dinon nirala ji ki pahlavan banne ka baDa jom tha. khoob kasrat karte ve aur badan banate the. ek din chaurasiya ji se bole, babuji, koi joD nahi milti.
chaurasiya ji bole, ghabrao mat. paragi pahlavan ko bulvaya hai.
kahi bahar ka rahne vala hai?
nahin, hai to yahi ka, par ajkal bahar gaya hua hai.
to use jhat pat bulvaiye.
uske baad se nirala ji paragi pahlavan se kushti laDne ke liye aatur rahne lage. ek din chaurasiya ji ne bataya ki paragi aa gaya hai. nirala ji mashuk ki tarah paragi pahlavan se milne ke liye bechain ho ge. chaurasiya jo ne kaha ki paragi ghobiyan ki gali mein rahta hai. nirala ji ko bhala sab kaha. pata puchhte hue vahan pahunch ge! kunDi khatakhtai. pahlavan bahar aaye. nirala ji unhen dekhte rahe. phir puchha ha aap ho paragi pahlavan hain?
ve bole, ha.
bas, phir bina kuch kahe sune hi vahan se chale aaye. chaurasiya ji se mile. bole, apke paragi ko abhi dekhkar chala aa raha hoon.
chaurasiya ji ne puchha, hai barabar ki joD ki nahin?
aji wo kya laDega mujhse? mujhe malum ho gaya, yahan koi meri joD ka pahlavan nahin hai.
chaurasiya ji bole, khair panDit ji, kuch harza nahin. kal laD to lena hi usse, aur kuch nahin to uska hausla hi wo jayega.
nirala ji ne bhaganbhan ha kah diya. dusre din rustmehind bane hue jhumte jhumte akhaDe mein pahunch ge. paragi ne ek ek karke unhen chaar baar patkani di. dusre hi din ek matki ghi lekar nirala ji paragi pahlavan ke yahan pahunche. bole, pahlavan khoob laDte hi. ya lo, ghi khayo.
uske baad paragi pahlavan se nirala ji ki baDi dosti ho gai. paragi ke alava us kshetr mein dulare kachhi ka bhi pahalvani mae baDa naam tha. ek baar nirala ji ke hausale aur chaurasiya ji ke paise ke bal par un donno ka dangal karaya gaya. dulare kachhi ka baDa dabadya tha. lekin jab paragi ne use pachhaD diya to nirala ji aise prasann hue mano unhonne hi kushti jiti ho. paragi se bole, tumhen sone ya meDal dunga.
nirala ji aur sone ka meDal hota. mitti ka bhi dete to sone se baDhkar hota.
mazme mae ek chitchor ji bhi ve—pas hi ke rajapur gaDheva gaanv ke rahne vale. nirala ji ke ilaqe mein mujhe agar chitchor na milte to maza adhura rah jata. lakho ki haimiyat se kam to ve baat hi nahin karte the, aur haal vaDa patla tha. kahne lage ki nirala ji hamse bahut kahe richitchor, kavita likho, chitchor kavita likho. par hum kah ki nahin. phir abhi haal hi mein hamne socha ki nirala ji hamare vaisbare ke ratan rahe, mitr rahe, itna kahte rahe to lao kavita likhe. phir kya tha nagar ji, hamne paanch kavitayen likh Dali. aapko pancho sunni paDengi.
pancho kavitayen chitchor ji ne kangres ne viruddh likhi thi. thaath ke saath sunai. phir puchha, bansi hain?
are. . . ! hamne kaha, ye kavitayen sun lete to nirala ji phir kavita likhna chhoD dete.
chitchor ji ye sunkar baDe santusht hue. bole, baDe ser adami rah nirala ji. hamare vaisvare ke ratam rahe, —ratan auf hot inDiya rah. aur tum samajh lev nagar ji, ki nirala ji mar to zarur ge, baqi ye batao ki unki rooh kahan hai.
hamne kahan, ruho tak hamari pahunch nahin. ye aap hi batala sakte hain.
bole, haan, hum hi batlay sakte hai. unki rooh kahi nahin gai. ek tantrik ne usko pakaD liya hai.
miting va samay ho raha tha. biharilal ji ne kaha ki bhojan karke udhar hi chala jaye. hum ghar ke andar ge. darvaze se ghuste hi dahliz se ek jagah pual ka Dher paDa tha. biharilal ji bole, kaka, yahain baithi kai likhat rahe. takiya chhati ke tale daba len, aur pauDe bhar, likha karen.
ghar ke andar angan ki kachchi chaharadivari kai jagah se toot chuki thi. baDa sasta haal tha. pichhvaDe ki taraf chaturi chamar ke ghar ki dival bhi dikhlai paD rahi thi. nirala ka ghar gaanv sab kuch jeern keern avastha mein tha. is ati pichhDe hue gaanv mein kichaD kada aur tute gharo ki basti dekh dekhkar mera man ek ajib khisiyan mein bharta ja raha tha.
hamara miDil klaas babu nirala ko rashtrapti bhavan mein pratishtha dilane ke liye machal raha hai. wo chahta hai ki nirala ka samman ho. rashtriy mahapurusha mein unhe samuchit sthaan mile. rashtrapti, matri, pardhan mantri, amuk ji, tamuk ji aadi unke yash gaye. main sochne laga ki ye vaisi ulti abhilasha hai logo ki. kaisa nikamma udyog hai unka. nirala ke thaath bhala yo ban sakte hai.
bhojan ke baad julus nikla. lohe ki kursi par chadar takkar us par nirala ji ka chitr rakhkar unhonne vash ka ek yuvak us sinhasan ko apne mar par uthaye hue aage aage chala. pichhe gaanv valo ka hujum. ghata shankh ghaDiyal ki dhvani aur uske pichhe chimta bhaabh kartal majire bajane aur gate hue chaturi ke bhai viradra ki bhagan manDli. beech beech mein bol de nirala baba ki jay ke nare.
gharon ne aurten aur bachche shor sunkar bahar nikl paDe the. gaanv ke liye is baar ki vasant panchmi ekdam nai hokar aai thi. main sochne laga ki mahakavi ne apne jivan kaal mein kabhi ye kalpana na ki hogi ki utre puranyo ke gaanv mein unka aisa samman hoga.
san 38 mein nirala jo yahan se dukhi hokar ge the, aur phir kabhi na aaye. uunchi jati ke loga mein dambh aur ashiksha ka bolabala tha. gharib janta baDi ki lathi mein buri tarah ast thi. julus mein saath saath chalne vale dhamni kheDa ke shri durgaprsad mishr aur kashiprmad mishr do bhai bhi the. rishte mae nirala ji unke mama hote the. kashiprsad ji kahne lage, san atthavan mein hum log vasant panchmi ke din nirala ji se milne ke liye ilahabad ge. unhonne baDi utsukta se yahan va ek ek haal puchha. mainne kaha ki ek baar phir gaanv chaliye. sunkar mama udaas ho ge. bahne lage ki kya jaye, vahan baDi ashiksha hai. mainne kaha ki ab gaDhakola aur vaimvara bahut badal gaya hai. vahan gaanv gaanv mein skool pathshale khul ge hain. zamidari bhi khatm ho gai hai. kisan ab apne kheto ke malik ho ge hain.
ispar mahakavi poochh baithe, gaDhakola ka lagan ab kaun leta hai?
mainne kaha, kurk amin vasul karte hain.
puchhne lage, kurk amin kiske adesh se vasul karte hain.
mainne vaha, sarkar ke adesh se.
sarkar ka naam sunte hi na jane kya hua ki mahakavi ne munh pher liya, aur kuch baDbaDane lage.
durgaprsad kah rahe the, is baar bhado mein hum phir unse milne ilahabad ge the. mahakavi yahan ka sab haal chaal puchhne lag. phir hamse kaha, gaDhakola jaiho.
mainne kaha, aap kah to chale jai.
nirala ji bole, hamka kaunon garj hai?
uske baad hum gaDhakola aaye. yahan se unke liye aam, amavat, khatai sab le ge. nirala ji ko apne baghiche ke aam bahut hi pasand the. mainne ek aam unki or baDhate hue kaha, bhadaila ko aam aay.
mahakavi dekhkar bole, nahi, yo myaaD par vale ko aay.
unhe apne baghiche ke ek ek peD ke aam ki pahchan thi. antim vaar unhonne apne gaanv ke aam khaye aur phir aam, amavat aur khatai aadi lekar apne putr ramkrishn ke ghar ge.
kachchi saDak se julus aage baDh raha tha. agal baghal donon or sarso phuli hui thi. kshetr ke blauk Devalapment afsar mere paas aaye. kahne lage, ye saDak jispar ki aap chal rahe hain, iska naam nirala maarg hai. gaanv vale ise shram daan se taiyar kar rahe hain. chhah meel ki ye saDak purva mein jakar milegi. phir vaha se unnaav tak yahi nirala maarg bana diya jayega.
unki baat puri bhi na ho pai thi ki panDit biharilal ji lapakte hue hamare paas aaye aur bain or ka ek khet dikhlate hue bole, yah khet ramashay baba ne nirala kaka ke naam se liya tha. kaghaz par surjakumar naam chaDha hai.
julus aur aage baDha. nirala bana ki jay ke nare aur shankh ghata ghaDiyalo ka naad is samay apne pure zor par tha. kinare par paDi ek maDaiya ke dhage khaDa hua ek vriddh baar baar apni ankhen ponchhne laga. gaDhakola ke ek sajjan ne batlaya ki ye pasi nirala ji ke paas bahut aaya jaya varna tha. ispar hathat mere man mein baat thai. chhoti kaum kahlane vale dabe pise log hi nirala ji ke naam par ronevalo mein yahan adhik hain. mainne chheDte hue puchha, yahan ke uunchi jaat valon mein kitne log nirala ji ke bhakt hain?
are bahut kam. ii pachai to mahashvi ka yadon nahin kartu hai.
main sochne laga ki ve log bhala nirala ko kyon yaad rakhen. nirala ji ne unki jatigat uchchata ko kabhi svikar nahin kiya. unke jhuthe dharm ko sada lato se thukraya. gharib majlumo ki avaz muni. unke liye taqatavra se jujhe. unke sukh dukh mein shamil hue, yahi vajah hai jo ye itni baDi bhagat manDli is julus mein uunchi jaat valo ki sankhya ko maat deti hui aage baDh rahi hai. mujhe baDa achchha lag raha tha. shiv apne bhutagno ve maan hari shobhit hote hain.
nirala baagh aa gaya. ye unke purkhon ka baagh hai. kunve vala ne chitchor gambhir ho ge. phir bole, achchha tau—ya tau ek rupya hamein dev ya hamme lev.
chitchor ji ke kahne ki ada mujhe baDi bhavi.
bhashan par bhashan hote rahe. maikrofon tha nahin aur ajkal amtaur par hamare paDhe likhe logo ke paas wo avaz nahi rah gai jo dam bees hazar ki kaun bahe, hazar paanch sau adamiyo wo bhi sunai paD sake. janta dhire dhire baDhti ja rahi thi. javan laDakiya, aurten, bachche, purush namag baDhte hi ja rahe the. hone vale tamage, yani ki bhashanbazi ke prati unme sahj akarshan tha. lekin baten buddh to sunai na paDti thi, aur kuch samajh mein na aati thi. imaliye baDhti bheeD mein shorgul bhi krmash baDhta hi jata tha.
mujhe laga ki is mele ko ek suniyojit roop dena chahiye—smrat—kushti va dagal, aurto ki banai hui grih shilp ki vastuon va pradarshan, kshetriy kaviyon ka sammelan, khel kood aur vaad vivad pratiyogitayen, yahan prativarsh hua karen to bahut achchha ho.
vasant panchmi ke avsar par prayag gaya tha. nirala ji kathin bimari bhogkar uthe the, socha ki is varsh unke saath hi unki jayanti mana loon. agle varsh ye avsar aaye ki na aaye. nirala ji durbal hone par bhi svasth the, khoob magn the. laug pair chhukar unhen haar pahnana chahte the aur naumra unki daDhi banate hue apna mahattv jatlakar apne apne haro ko nirala ji ke charno par rakhne ke liye achchhi achchhi ko baDi shaan se adesh de raha tha.
is baar phir vasant panchmi ai—nirala ji ke nidhan ke baad pahli vasant panchmi. patr patrikaon ne visheshank nikale, jagah jagah nirala parishdo ka udghatan kiya gaya, baDe ho halle hue. marne ke baad dilli ke rashtrapti bhavan mein bhi nirala ji ki aarti utari gai.
vasant panchmi se chhः saat din pahle gaDhakola gram se nirala ji ke bhatije shri biharilal tripathi aur unke anya do chaar sage sambandhi mere yahan aaye. ve log gaDhakola mein nirala jayanti manana chahte the, aur is ghair tevar ke saath aaye the ki laat sahab ko vahan le chala jaye. unme se ek bandhu to apne bholepan mein puri skeem bakhan ge. bole, hamne pahle vichar kiya ki sidhe laat sahya ke paas chalen. nirala ji ke naam par na to ve kar hi nahi sakte, aur karte bhi to hum kahte ki hum panno mein apaki alochana karenge. apni alochana se to sabhi ghabrate hai, so wo razi ho jate.
mujhe laga ki ye log nire bholepan mein apni ahta ko tusht karne ke liye nirala ji rupi lathi ke dvara baDe baDo ko hakkar apne gharib guman ke baaD mein band kar lena chahte hai.
biharilal ji ne adhik samajhdari ki baten ki. kahne lage, nirala kaka hamare bhi to the. hum log gharib hai, par yathashakti apne yahan bhi nirala kaka ka utsav manana chahte hai. aap jaisa kahge, vaisa karenge.
mainne kaha, is saal to kisi bhavya ayojan ke liye samay nahin raha. aap log sidhe sade Dhang se nirala jayanti mana len. agle varsh koi baDa ayojan kijiyega.
ve log is baat par razi ho ge. tay hua ki main vasant panchmi ke din subah pahli bas se purva pahunch jaun. vahan se ve log mujhe gaDhakola le jayenge.
subah saDhe aath nau tak bas purva pahunch gai. chunav ke din the hi. bas ke aDDe ke paas hi halvaiyon ki dukanon ke alava kangres aur jansangh ki chunav dukanen bhi suni hui thi. laal, pili, safed topiyan nazar aa rahi thi. lauDaspikar par ya kahani hai diye ki aur tufan ko, nirbal mae laDai balvan wo vala filmi rikarD baDe zor shor se baj raha tha.
hum bas se utre. yahan sab kuch tha, magar gaDhakola parti ke log vahi nahin dikhlai paDe. aadh ghante ke baad akhir biharilal ji do anya vyaktiyan ke saath saikilo par aa pahunche. unhen dekhkar jaan mein jaan aai. tabhi ek dusri samamya upasthit hui. biharilal ji ne kisi se bailgaDi ka prbandh diya tha. ain samay par laDhapati ne lata dene se inkaar kar diya. purva mein do teen Dakke to avashya saDe the. par ve chunav ke dinon mein ek khadidhari netanuma vyakti wo gaDhakola le jane ke liye paanch rupe maang rahe the.
biharilal ji baDe shashopaj mein paDe.
main svayan bhi thoDe rupe lekar hi ghar se chala tha. isliye ek aur ke paanch rupe ret par razi na hua.
ab kya kiya jaye. samne teen saikilen hi nazar aa rahi thi.
saikil chalana mein vajiv hi vajiv janna hu. tees paintis saal pahle apne saikildhari mitro ke dabav se mainne ye kartab sikha tha. un dinon main bahut mota tha. isliye saikil aisi mavari mujhe napsand thi. keval doston ke saath sair karne ke liye kabhi kabhi majburan uska prayog karna pahna tha. kisi phutpath ve sahare saikil par savar hokar jaya karta. jab utarna hota to saikil wo bhukakar utar paDta. san 37 mein ek baar mein saikil se gaDabDakar taza koltar paDi hui saDak par gir paDa tha. tab se phir kabhi saikil par chaDhne ka naam tab na liya.
lekin yahan saikli mein alava aur koi sadhan hi nazar na aaya. socha ki bajrang bali ka naam lekar ab isipar chaDha jaye. jo hoga so dekha jayega.
ek jagah taang uchhalne bhar ka ek zara uncha sa mitti ya Dhooh tha, uske sahare saikil par savar ho gaya. yachchi baluha saDak par nahr ke kinare kinare hum chal paDe. raste bhar manate chale ja rahe the ki he raam ji, kahin ladd se gir na paDen jisse hamari hami uDe.
gaanv ab aadh paun meel hi door rah gaya tha. tabhi ek aur vikt samamya aai. samne chhः saat bailgaDiya env pankti mein chali ja rahi thi. sochne laga inse bachkar kaise niklunga. sathi bhi shayad meri paristhiti ko samajh ge. aage baDhkar saDhevalo ko ek or ho jane ke liye huDdang machane lage. par vahan jagah hi na thi. main utar paDa. un longo se kaha, aap log chaliye. hum aur biharilal ji paidal aate hain.
apni saikil mujhe de dene ke karan biharilal ji evan saikil ke kairiyar par baithkar aa rahe the. isse unki bhi haDDi pasaliyan yaal hui thi.
pulim mein unhen naukari mil gai. hote karte zamadar ho ge. phir hua laat saheb ke man chaDh ge aur unki aradli mae chale ge. laat saheb hamesha ramamhay baba ko apne saath saath rakhe. to ek baar mahipadal mahraj ke hiya laat saheb ge. mahipadal mahraj ne ramamhay baba ko dekha to laat saheb mein kaha ki inhe hamein de dijiye, hamare yahan aisa koi zamadar nahin hai. laat saheb ne unhen de diya. ramashay baba mahipadal mein rahne lage. phir saan bhar baad ramlal baba bhi vahi chale ge.
bangal ki mahipadal stet mein kanyakubj brahmnon ke pahunchne ki evan kya main lakhanuu mein bhi sun chuka tha. yahan ramkrishn mishan mein ek sanyasi rahne the. unka poorv naam tha kashinath malaviy. mishan ke patr samanvay ka sampadan karya nirala ji ke baad unhe hi saumpa gaya tha. malaviy ji unke purane mitron mae se ek hain. unke kathnanusar, mahipadal ki ek vidhva rani thi. unka putr bahut pahle hi mar chuka tha. ek din ek sanyasi aaya aur kahne laga ki ghabrao mat, tumhara putr ne roop mein tumhe avashya milega. uska punarjanm ho chuka hai, aur wo tumhare paas ayega. iske kuch kaal baad hi ek sanyami navyuvak mahipadal pahuncha. rani ko ye vishvam ho gaya ki vahi unka punarjanm praapt putr hai. unhone adarpurvak use vahi rok liya, aur gaddi par bithaya. wo kanyakubj brahman tha, isliye uske raja hone par anek kalaunjiya brahman vahan aakar bas ge.
sarso svarg ki lakshmi ki tarah kheto mein antriksh se antriksh tak chhai hui thi. dayen bayen jidhar bhi drishti ghumti sarso ka pilapan man ko vaagh leta tha.
hum log nahr ke dahini or muDe. peDo ke jhurmut ke paar mandir ka kalash chamak raha tha. yahi gaDhakola tha. man mein ek kurkuri si dauD gai. gram gaDhakola, post chamiyani, zila unnaav ko nirala ji apni kahani chaturi chamar mein sada ke liye amar kar chuke hain. sab to ye hai ki gaDhakola mere man mein nirala ji ne gaanv se adhik chaturi chamar ke gaanv ke roop mein bana hua hai. yahan aate hi kanika nau aur chaturi chamar ki yaad aane lagi.
kalakar ka baDappan isi mein hai ki usse adhik pathko ko uske patro ki yaad aaye.
mujhe achchhi tarah se yaad hai. sudha mein jab pahli baar chaturi chamar pata tha to mere man ko ek vichitr tazgi mili thi. premchand ke anek gramin aur chhoti kaum ke paatr man ko prabhavit karte the, —tab bhi aur ab bhi. premchand ji ke un patro ko paDhte samay aisa lagta tha ki mano sinema drishya mein unhe dekh raha hoon. lagta tha jaise chaturi aise log samne hi khaDe ho. ho sakta hai ki mujhpar ye prabhav nirala ji ki sangat ke karan paDa ho. devi, chaturi chamar, mukul ki bivi, kulli bhaat, raja sahab ko thenga dikhaya aadi nirala ji ki aisi rachnayen hai jinhen patat samay ye nahin lagta ki hum koi gaDha hua qissa paDh rahe hain. lekhak in rachnaon mein apnepan ka sparsh deta hai. ye kahaniyan athva rekhachitr darasal sansmran ke roop mein hi adhik ubharkar chate hai.
khet prishthabhumi mae chhoot ge. basti aane lagi. mitti ke kachche ghar, unmen bhi adhikansh sanDhar, galiyan beech mein dhasi aur gaDDon se bhari hui, gharo ke samne kai jagah machchhron ke guchchhon se bachchhadit navadan, kahin gaye, kahin bail aur kutte.
galiyo mae chakkar lagate hue hum ek makan ke samne aa khaDe hue. purani naqqashi vale dvaar par ek kaghaz chipka tha. uspar likha tha mahapran nirala smarak bhavan. mainne biharilal ji mein kaha, ghabraiyega mat. aapka ye kaghaz sangmarmar se adhik tikau siddh hoga.
wo bechare kuch samjhe nahin, jhempkar bole kya karen paDit ji, apne man ka hausla pura kar liya. nahin to jaun aap sangmarmar ne patthar ki baat kar rahe hain, vahai hamreu man ma rahi. aaj to nirala kaka sabke hain par ek din raha jab nirala matra hamrehe hamrehe rahe. inaphluija mae hamare baap mahtari mar ge. hum naanh naanh rahe. nirala kaka chakkivi pisen, hamka banay mein khavabai, hamka palai. ramkesan hore tau ulamuu ma raht rahen nana ke hihya, au nirala kaka hamre paas rahai. kaki. hamari guzar gai rahen to inhen byaah ke liye bahut log gherai, bahut dakhua aavai.
ek vajapei ji rah. uD aaye au kahai lage, maharaj, apaki kunDli ma dusar bihab liya hai. kaka kahin, are jab hamhe na karav to kaha te hoi. hamre chaar larika ii aay au ramkesan au viteva aay. hum inhi ka nahin paal sakavi hayi. tum hamka byaah karai ke liye kahat ho.
apni janmapatri ke grah nakshatra ko nirala ji hi pachhaD sakte the. anek logo ne anek baar unki kunDli dekhkar batlaya ki dusra vivah likha hai, par jan nirala ji hi nahi karna chahte the to grah nakshatron ki hasti hi kya thi jo unka vivah karva sakte. ek baar jab unki beti saroj se unki janmapatri phat gai to nirala ji use ganga ji mein prvahit kar aaye. kaha, na rahega yaas, aur na bajegi bansuri.
ghar ke aage dahini or par ek chhoti si khuli zamin thi. vaha shamiyana laga ya, takhat paDhe the. takhat par ek chauki aur chauki par ek lohe ki kursi rakhi hui thi. mainne biharilal ji se lakhanuu mein vahan tha ki nirala ji ya chitr le auunga. anek varshon pahle mere chhote bhai prakhyat chitrkar madan laal nagar ne prayag jakar nirala ji ka ek chhota tail chitr banaya tha. usne adhar par phir ek baDa tail chin bhi usne banaya jo ab lakhanuu mahapalika ke magrhalay mein surakshit hai.
chhota chitr anek varsh hue nirala jayanti ke avsar par ek kavi mahoday mujhse mangakar le ge the. phir unhonne use lautaya hi nahin. mainne biharilal ji ko vahi chitr la dene ka vachan diya tha. kavi bandhu ke yahan se chitr to ghair mainne kisi tarah mangva liya, par raam jane unhonne use kaha silan pani ma Daal rakha tha ki tasvir puri taur par nasht ho gai thi.
biharilal ji ne usi chitr ki aasha mae ye sinhasan sajakar rakha tha. par ab kya ho. ek sajjan bole, dharmyug mein nirala ji ka chitr hai. use hi katkar kisi lakDi ke takhte par chipka diya jaye.
dharmyug ka ank aaya. kisi vidyarthi ki patti aai. kisi ne kisi ko lei banan ka hukum diya. mainne kaha, uski avashyakta nahin. dharmyug, se chitr ko phaDne ki avashyakta nahi, Dori le aaie. sar ke phool le aaie. kaam ban jayega.
mainne patti par dharmyug ke panne ulatkar wo chitr badha, sarson ke phool charo or se is tarah se khose ki unka phrem ban gaya. gende ke phool bhi aa ge. unhe bichon beech mein sajaya. aisi shobha aa gai ki kya kahun.
biharilal ji ne apni shakti bhar baDa ayojan kiya tha. aas paas ke ganvo mein logo ko nyauta bhijvaya tha. jhaiyam jhaiyam baja bhi mangvaya tha. aisa lagta tha ki jaise ramashay tripathi ke ghar aaj ho surya kumar ka janm hua ho. magrayar gram ke ek yuvak ne kaha bhi ki aaj nirala ji ki pahli janmganth hai. ek tarah se ye bhi sach tha. unke gaanv main unka ye pahla hi janmotsav manaya ja raha tha. nirala ji paida bangal mein hue, isliye unke janmoplakshya mein jo kuch bhi khushiyali hui hogi, bah mahipadal mae ho.
shamiyane ke niche, balki yo bahu ki uske bahar evan purush baithe the. kisi ne bataya ki ve chaturi ke bhatije bhagvandam hai. unki aayu vakaul unke paach uupar sattar thi. mainne puchha, panDit ji jab pahli baar bangal se gaanv aaye to unki kya umar thee?
bhagvandas bole, kaniya maan rahe, tab dui ek dai aaye rahain. baqi tyara chauda baras ke rahe tab uD hihya aaye. bara bara gyaad khele. is par mahavir naam ke ek sajjan bole, goli din din bhar syalai. ve pancho ungaliyo se alag alag goli maar lete the.
bhagvandam ji ka bhaav umath raha tha. kahne lage, panDit ji, hum pachan na itna maant rahen ki apne parivarhan na mane aur phir jab ui baDe huige hiya aavai tau hum pachai unka chhaDi ke chaur kauno kaam nahi kihin. kushti laDavai ka bahut mauqa raha. sabka ek ek lagota banvain.
rashtriy andolan mein nirala ji ne apne gaay ke zamindar ke atya charo ke viruddh bahut baDa andolan chalaya. thi gaya parsad, shri bhagvandas, shri mahavir evan mein ek baat joDkar sunane lageh mitin hot rahai. ek motin nirala ji karain, balkrishn sharma navin aaye rahe. devin ke paas tabu gaDi ke mitin bhai. bahu zamane bhar lagan adai to hauti na rahai, taun raiyatu mari piti jaye, vahi zamana ma dui chaar pitvayenge, taun nirala ji risayenge, kisan sangthan karain pure gaanv zamino ka istifa karay diya—dui chaar log chahe na kihin hoy baqi sab kihin. saal bhar zamin parti paDi rahi.
nirala ji ke andalankari roop ki kalpana to main sahj hi kar sakta tha. chaturi chamar mein unhonne un dinon ka byaura diya hai. anyay ke viruddh apni avaz uthaye bina—nirala ji rah hi nahi sakte the.
saroj ke vivah ki nirali katha bhi suni. panDit gaya parsad ji gaanv ke un vyaktiyon mein se hain jinh, nirala ji apna mitr mante the. unhonne batlaya, saroj ke var (shivshekhar jee) gaanv mein hi maujud the. nirala ji ne apni beti ka vivah unhi se kar dene ka nishchay man hi man kar liya tha. ek din sabere hum te kahin ki chalau gaya parsad kanpur. saman lana hai. aaj hamare hiya barat aai. kanpur te phal dhoti sab saman laye. gular ki Daal gaDi gai. magrayar te nand dulare vajapei aaye, radharman aaye. nirala ji panDit ka bulain. kaha, mantr paDhau. saroj ker sadi aaye.
panDit bole, aise kaise sathi hoi hai?
nirala ji bole, tumhen kya malum, kitne prakar ke vivah hote hain. jaisa main kahun vaisa karo.
bas vihav hoiga.
avadhi ke ek taran kavi surjaprsad dvivedi nirala ji dvara bighapur steshan par lalamani ji ko thaal bhar barfi khilane ka qissa sunane lage. bole, yah baat mainne lalamani ji se guni thi aur ispar mainne ek kauvali bhi likhi hai.
kavvali ka naam sun hamein maza ya gaya. sunane ke liye kaha. suraj parsad ji sunane lage.
aaj barfi mile saun
to maza aa jaye.
aur chaku se chhilaun
to maza aa jaye.
dosto sun lo ye qissa baDa purana hai.
mahakaviraj nirala ko jagat mana hai.
gaDhakola mae janmabhumi kavya mana hai.
rahe prayag tirthraj man lubhana hai.
vahi drishtant sunaun to maza aa jaye.
aaj barfi mile, khaun
to maza tha aaye!
aa rahi gaDi bareli se chali bighapur,
khatakhat baant rahe the tikat khaDe mayur.
pletfarm mein shor gul macha jaise dadur,
do yuvak kar rahe the batachit prematur.
mitravar man ki bataun to maza tha jaye.
aaj barfi jo khaun
to maza aa jaye!
suna baton ko nirala ji muskuraye hain.
dabe panvo hi yahan se turant sidhaye hai
utha dukan se barfi ka thaal laye hain
samne lake rakha mriduvchan sunaye hain.
aji baitho mein khilaun to maza aa jaye.
aaj barfi jo khaun
to maza tha jaye.
dekh lila ko nirala ki wo lajaye hain,
chakit hoke charan kamlo mein sar jhukaye hai.
hath thaal mein hi barfiyan khilaye hain
lauta ke hue daam jo chukaye hain.
ma suraj jo baDhaun to maza aa jaye.
aaj barfi jo khaun
to maza tha jaye.
magrayar ke shri revati shankar shukl ne nirala ji ke pahalvani ke qisse sunaye. unhonne bataya ki gaDhakola mein ek rais raha karte the. nirala ji se unki baDi maitri thi. unhin ki prerna se chaurasiya ji ne magrayar mein vinavani pustakalaya ki sthapana bhi ki. panDit nandadulare vajapeyi bhi magrayar gram ke nivasi hai. nirala ji tatha unke pita chaurasiya ji se milne ke liye avsar vaha jaya karte the. un dinon nirala ji ki pahlavan banne ka baDa jom tha. khoob kasrat karte ve aur badan banate the. ek din chaurasiya ji se bole, babuji, koi joD nahi milti.
chaurasiya ji bole, ghabrao mat. paragi pahlavan ko bulvaya hai.
kahi bahar ka rahne vala hai?
nahin, hai to yahi ka, par ajkal bahar gaya hua hai.
to use jhat pat bulvaiye.
uske baad se nirala ji paragi pahlavan se kushti laDne ke liye aatur rahne lage. ek din chaurasiya ji ne bataya ki paragi aa gaya hai. nirala ji mashuk ki tarah paragi pahlavan se milne ke liye bechain ho ge. chaurasiya jo ne kaha ki paragi ghobiyan ki gali mein rahta hai. nirala ji ko bhala sab kaha. pata puchhte hue vahan pahunch ge! kunDi khatakhtai. pahlavan bahar aaye. nirala ji unhen dekhte rahe. phir puchha ha aap ho paragi pahlavan hain?
ve bole, ha.
bas, phir bina kuch kahe sune hi vahan se chale aaye. chaurasiya ji se mile. bole, apke paragi ko abhi dekhkar chala aa raha hoon.
chaurasiya ji ne puchha, hai barabar ki joD ki nahin?
aji wo kya laDega mujhse? mujhe malum ho gaya, yahan koi meri joD ka pahlavan nahin hai.
chaurasiya ji bole, khair panDit ji, kuch harza nahin. kal laD to lena hi usse, aur kuch nahin to uska hausla hi wo jayega.
nirala ji ne bhaganbhan ha kah diya. dusre din rustmehind bane hue jhumte jhumte akhaDe mein pahunch ge. paragi ne ek ek karke unhen chaar baar patkani di. dusre hi din ek matki ghi lekar nirala ji paragi pahlavan ke yahan pahunche. bole, pahlavan khoob laDte hi. ya lo, ghi khayo.
uske baad paragi pahlavan se nirala ji ki baDi dosti ho gai. paragi ke alava us kshetr mein dulare kachhi ka bhi pahalvani mae baDa naam tha. ek baar nirala ji ke hausale aur chaurasiya ji ke paise ke bal par un donno ka dangal karaya gaya. dulare kachhi ka baDa dabadya tha. lekin jab paragi ne use pachhaD diya to nirala ji aise prasann hue mano unhonne hi kushti jiti ho. paragi se bole, tumhen sone ya meDal dunga.
nirala ji aur sone ka meDal hota. mitti ka bhi dete to sone se baDhkar hota.
mazme mae ek chitchor ji bhi ve—pas hi ke rajapur gaDheva gaanv ke rahne vale. nirala ji ke ilaqe mein mujhe agar chitchor na milte to maza adhura rah jata. lakho ki haimiyat se kam to ve baat hi nahin karte the, aur haal vaDa patla tha. kahne lage ki nirala ji hamse bahut kahe richitchor, kavita likho, chitchor kavita likho. par hum kah ki nahin. phir abhi haal hi mein hamne socha ki nirala ji hamare vaisbare ke ratan rahe, mitr rahe, itna kahte rahe to lao kavita likhe. phir kya tha nagar ji, hamne paanch kavitayen likh Dali. aapko pancho sunni paDengi.
pancho kavitayen chitchor ji ne kangres ne viruddh likhi thi. thaath ke saath sunai. phir puchha, bansi hain?
are. . . ! hamne kaha, ye kavitayen sun lete to nirala ji phir kavita likhna chhoD dete.
chitchor ji ye sunkar baDe santusht hue. bole, baDe ser adami rah nirala ji. hamare vaisvare ke ratam rahe, —ratan auf hot inDiya rah. aur tum samajh lev nagar ji, ki nirala ji mar to zarur ge, baqi ye batao ki unki rooh kahan hai.
hamne kahan, ruho tak hamari pahunch nahin. ye aap hi batala sakte hain.
bole, haan, hum hi batlay sakte hai. unki rooh kahi nahin gai. ek tantrik ne usko pakaD liya hai.
miting va samay ho raha tha. biharilal ji ne kaha ki bhojan karke udhar hi chala jaye. hum ghar ke andar ge. darvaze se ghuste hi dahliz se ek jagah pual ka Dher paDa tha. biharilal ji bole, kaka, yahain baithi kai likhat rahe. takiya chhati ke tale daba len, aur pauDe bhar, likha karen.
ghar ke andar angan ki kachchi chaharadivari kai jagah se toot chuki thi. baDa sasta haal tha. pichhvaDe ki taraf chaturi chamar ke ghar ki dival bhi dikhlai paD rahi thi. nirala ka ghar gaanv sab kuch jeern keern avastha mein tha. is ati pichhDe hue gaanv mein kichaD kada aur tute gharo ki basti dekh dekhkar mera man ek ajib khisiyan mein bharta ja raha tha.
hamara miDil klaas babu nirala ko rashtrapti bhavan mein pratishtha dilane ke liye machal raha hai. wo chahta hai ki nirala ka samman ho. rashtriy mahapurusha mein unhe samuchit sthaan mile. rashtrapti, matri, pardhan mantri, amuk ji, tamuk ji aadi unke yash gaye. main sochne laga ki ye vaisi ulti abhilasha hai logo ki. kaisa nikamma udyog hai unka. nirala ke thaath bhala yo ban sakte hai.
bhojan ke baad julus nikla. lohe ki kursi par chadar takkar us par nirala ji ka chitr rakhkar unhonne vash ka ek yuvak us sinhasan ko apne mar par uthaye hue aage aage chala. pichhe gaanv valo ka hujum. ghata shankh ghaDiyal ki dhvani aur uske pichhe chimta bhaabh kartal majire bajane aur gate hue chaturi ke bhai viradra ki bhagan manDli. beech beech mein bol de nirala baba ki jay ke nare.
gharon ne aurten aur bachche shor sunkar bahar nikl paDe the. gaanv ke liye is baar ki vasant panchmi ekdam nai hokar aai thi. main sochne laga ki mahakavi ne apne jivan kaal mein kabhi ye kalpana na ki hogi ki utre puranyo ke gaanv mein unka aisa samman hoga.
san 38 mein nirala jo yahan se dukhi hokar ge the, aur phir kabhi na aaye. uunchi jati ke loga mein dambh aur ashiksha ka bolabala tha. gharib janta baDi ki lathi mein buri tarah ast thi. julus mein saath saath chalne vale dhamni kheDa ke shri durgaprsad mishr aur kashiprmad mishr do bhai bhi the. rishte mae nirala ji unke mama hote the. kashiprsad ji kahne lage, san atthavan mein hum log vasant panchmi ke din nirala ji se milne ke liye ilahabad ge. unhonne baDi utsukta se yahan va ek ek haal puchha. mainne kaha ki ek baar phir gaanv chaliye. sunkar mama udaas ho ge. bahne lage ki kya jaye, vahan baDi ashiksha hai. mainne kaha ki ab gaDhakola aur vaimvara bahut badal gaya hai. vahan gaanv gaanv mein skool pathshale khul ge hain. zamidari bhi khatm ho gai hai. kisan ab apne kheto ke malik ho ge hain.
ispar mahakavi poochh baithe, gaDhakola ka lagan ab kaun leta hai?
mainne kaha, kurk amin vasul karte hain.
puchhne lage, kurk amin kiske adesh se vasul karte hain.
mainne vaha, sarkar ke adesh se.
sarkar ka naam sunte hi na jane kya hua ki mahakavi ne munh pher liya, aur kuch baDbaDane lage.
durgaprsad kah rahe the, is baar bhado mein hum phir unse milne ilahabad ge the. mahakavi yahan ka sab haal chaal puchhne lag. phir hamse kaha, gaDhakola jaiho.
mainne kaha, aap kah to chale jai.
nirala ji bole, hamka kaunon garj hai?
uske baad hum gaDhakola aaye. yahan se unke liye aam, amavat, khatai sab le ge. nirala ji ko apne baghiche ke aam bahut hi pasand the. mainne ek aam unki or baDhate hue kaha, bhadaila ko aam aay.
mahakavi dekhkar bole, nahi, yo myaaD par vale ko aay.
unhe apne baghiche ke ek ek peD ke aam ki pahchan thi. antim vaar unhonne apne gaanv ke aam khaye aur phir aam, amavat aur khatai aadi lekar apne putr ramkrishn ke ghar ge.
kachchi saDak se julus aage baDh raha tha. agal baghal donon or sarso phuli hui thi. kshetr ke blauk Devalapment afsar mere paas aaye. kahne lage, ye saDak jispar ki aap chal rahe hain, iska naam nirala maarg hai. gaanv vale ise shram daan se taiyar kar rahe hain. chhah meel ki ye saDak purva mein jakar milegi. phir vaha se unnaav tak yahi nirala maarg bana diya jayega.
unki baat puri bhi na ho pai thi ki panDit biharilal ji lapakte hue hamare paas aaye aur bain or ka ek khet dikhlate hue bole, yah khet ramashay baba ne nirala kaka ke naam se liya tha. kaghaz par surjakumar naam chaDha hai.
julus aur aage baDha. nirala bana ki jay ke nare aur shankh ghata ghaDiyalo ka naad is samay apne pure zor par tha. kinare par paDi ek maDaiya ke dhage khaDa hua ek vriddh baar baar apni ankhen ponchhne laga. gaDhakola ke ek sajjan ne batlaya ki ye pasi nirala ji ke paas bahut aaya jaya varna tha. ispar hathat mere man mein baat thai. chhoti kaum kahlane vale dabe pise log hi nirala ji ke naam par ronevalo mein yahan adhik hain. mainne chheDte hue puchha, yahan ke uunchi jaat valon mein kitne log nirala ji ke bhakt hain?
are bahut kam. ii pachai to mahashvi ka yadon nahin kartu hai.
main sochne laga ki ve log bhala nirala ko kyon yaad rakhen. nirala ji ne unki jatigat uchchata ko kabhi svikar nahin kiya. unke jhuthe dharm ko sada lato se thukraya. gharib majlumo ki avaz muni. unke liye taqatavra se jujhe. unke sukh dukh mein shamil hue, yahi vajah hai jo ye itni baDi bhagat manDli is julus mein uunchi jaat valo ki sankhya ko maat deti hui aage baDh rahi hai. mujhe baDa achchha lag raha tha. shiv apne bhutagno ve maan hari shobhit hote hain.
nirala baagh aa gaya. ye unke purkhon ka baagh hai. kunve vala ne chitchor gambhir ho ge. phir bole, achchha tau—ya tau ek rupya hamein dev ya hamme lev.
chitchor ji ke kahne ki ada mujhe baDi bhavi.
bhashan par bhashan hote rahe. maikrofon tha nahin aur ajkal amtaur par hamare paDhe likhe logo ke paas wo avaz nahi rah gai jo dam bees hazar ki kaun bahe, hazar paanch sau adamiyo wo bhi sunai paD sake. janta dhire dhire baDhti ja rahi thi. javan laDakiya, aurten, bachche, purush namag baDhte hi ja rahe the. hone vale tamage, yani ki bhashanbazi ke prati unme sahj akarshan tha. lekin baten buddh to sunai na paDti thi, aur kuch samajh mein na aati thi. imaliye baDhti bheeD mein shorgul bhi krmash baDhta hi jata tha.
mujhe laga ki is mele ko ek suniyojit roop dena chahiye—smrat—kushti va dagal, aurto ki banai hui grih shilp ki vastuon va pradarshan, kshetriy kaviyon ka sammelan, khel kood aur vaad vivad pratiyogitayen, yahan prativarsh hua karen to bahut achchha ho.
स्रोत :
पुस्तक : जिनके साथ जिया (पृष्ठ 30)
रचनाकार : अमृतलाल नागर
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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