तरुण भारतीय का परिचय
तरुण भारतीय की कविताओं की जड़ें दो तरह की संस्कृतियों में हैं, एक तो उनकी बिहार की मिथिलांचल की अपनी संस्कृति, जहाँ से वो हैं और दूसरे उत्तर पूर्व में, ख़ासकर मेघालय की जो संस्कृति है, क्योंकि उनका बचपन और किशोर-अवस्था शिलॉन्ग में गुज़री। जहाँ से वह सीधे दिल्ली आ गए। यहाँ किरोड़ीमल कॉलेज से उन्होंने ग्रेजुएशन किया और फिर एनएसआरसी से उन्होंने मीडिया की डिग्री ली। उसके बाद कुछ साल उन्होंने एनडीटीवी में काम किया, फिर वह इंग्लैंड चले गए थे। कुछ वर्षों बाद भारत वापस आकर शिलॉन्ग में अपने परिवार के साथ बस गए। उनके परिवार में उनकी पत्नी (जो कि खासी समुदाय से हैं) और तीन बच्चे हैं।
तरुण की कविता अपने समय का विद्रोही स्वर है। तरुण ने अपनी कविता में और अपने दूसरी रचनाओं में यही इंटरवेंशन किया है। वह ‘रॉएट टाइम्स’ नाम से एक वेबसाइट भी चलाते थे। इसमें विविध आयामी सामग्री आया करती थी। उनकी पत्रिका एक तरह से उनकी कविताओं का व्यक्तित्व हैं, उसका प्रतिबिंब है। वह केवल कवि नहीं थे, उनके व्यक्तित्व के कई और आयाम ज़्यादा प्रॉमिनेंट थे। बल्कि पोएट तो वह थोड़े रिलेक्टेंट थे।
शुरूआती दौर में तो अपनी कविताओं को लेकर वह मूक थे। वह फ़िल्मकार थे, फ़ोटोग्राफर थे, अनुवादक थे, बहुत अच्छे वीडियो एडिटर थे, सामाजिक कार्यकर्ता थे और पॉलिटिकल एक्टिविस्ट भी थे। ये सारी चीज़ें उनके जीवन का हिस्सा थीं, जो कहीं न कहीं उनकी कविता की रचना-प्रक्रिया का भी हिस्सा हैं। कविता एक तरह से उनका बाय-प्रोडक्ट है। “ही डिड नॉट बिगिन ऐज़ ए पोएट।” वे कविता लिखने की दुनिया में साहित्य की संगत में धीरे-धीरे प्रविष्ट हुए। कविताओं में उनकी रुचि कुछ-कुछ आधुनिकतावादी और कुछ-कुछ उत्तरआधुनिकतावाद से प्रभावित रही जो कि अब एक ख़राब शब्द बन गया है।
तरुण अपने पीरियड की अराजक टेंडेंसीज के मुहावरे से हमेशा बहुत प्रभावित रहे। लिहाज़ा उनकी कविता में एक बड़ा सूक्ष्म ढंग का बिखराव मिलेगा, ऐसा बिखराव जिसको वह प्लान करते हैं, लेकिन कहीं भी वह अपने प्रतिरोध और विद्रोह के स्वर से समझौते नहीं करते। हर चीज़ को चैलेंज करने की उनकी आदत थी। तो कहीं न कहीं उन पर राजकमल चौधरी का महत्त्वपूर्ण प्रभाव था। उन्होंने राजकमल चौधरी को देर से डिस्कवर किया; लेकिन पाया कि 60 के दशक में इस तरह का इनोवेटिव और पाथ ब्रेकिंग काम बहुत कम देखने को मिलता है, बल्कि वह मुक्तिबोध के बाद राजकमल चौधरी को ही हिंदी के नए काव्य-क्षेत्र का अग्रदूत मानते थे। राजकमल मैथिली में भी लिखते थे, इसका भी उनके ऊपर असर था। एक तरह की बीटनिक और विद्रोही जनरेशन है, उसका संस्कार भी उनकी विरासत का हिस्सा थी। आज के जीवन के जो विडम्बनाएँ हैं, उन पर ही वह फ़ोकस करते थे। उनकी कोई भी कविता हैप्पी पोयम नहीं है। उसमें कोई राग-रंग या उत्सव बिल्कुल नहीं है। वह चीज़ों को क्रिटिकली देखते हैं। वह इसको बचाओ, उसको बचाओ जैसी बात नहीं करते। वह अपनी कविताओं की मार्फ़त बड़ी तीखी, तुर्श और एक तरह से विध्वंसक आवाज़ में आलोचना करते हैं।
अपने समय की जो राजनीतिक परिस्थितियाँ हैं, फ़ाशीवाद का जो उभार है भारत में ख़ासकर हिंदुत्ववादी फ़ाशीवाद; उसको लेकर वह हमेशा चिंतित रहते थे, जिसका वह अपनी कविताओं में भरसक विरोध करते थे। उनकी कविताओं में भी जगह-जगह वह रेफ़रेंस आते हैं और कई बार वह बड़े प्रोवोकेटिव ढंग से चैलेंज करते थे।
तरुण की प्रमुख चिंताओं में पूर्वोत्तर राज्यों के साथ हिंदी पट्टी के लोगों का अंतर्विरोधी रुख शामिल था। अक्सर हिंदी प्रदेश के लोग नॉर्थ ईस्ट जाते हैं और वहाँ हिंदी और हिंदी प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं। यदि उन समाजों में आप अपनी हिंदी बेल्ट की राजनीति, यहाँ के संस्कार, यहाँ के अंतर्विरोधों को आप इम्पोर्ट कर लेते हैं तो उन समाजों को समझने, उनमें रमने और उनको रिप्रेजेंट करने की बजाय जो पाखंड है हमारे हिंदी प्रदेश की सांस्कृतिक और भाषाई विरासत का, उसी को जताने में लग जाते हैं। उत्तर पूर्व के साथ इस अंतर्विरोध को लेकर वो चिंतित रहते थे।
उनका मानना था कि हम मेनलैंड हिंदुस्तान से ही बिलॉन्ग नहीं करते हैं, हम नॉर्थ ईस्ट के भी लोग हैं। चूँकि वह स्वयं भी वही बस गए थे, उनका परिवार भी नॉर्थ ईस्ट का ही है। बाय एन्ड लॉर्ज तो वो मेनलैंड वर्सेज नॉर्थ ईस्ट उनका जो अंतर्विरोध है, उससे वह अपना गहरा कंसर्न रखते थे। इसीलिए एक प्रोवोकेटिव जेस्चर उनकी ख़ासियत है, जैसे कि वह कहते थे, “कि तुम अपने को बहुत बड़ी चीज समझते हो। भारत अपने को महादेश कहता है और हिंदी-पट्टी की संस्कृति को ही अपेक्षाकृत महान् बताता है। जबकि देश की बाक़ी सारी छोटी-छोटी संस्कृतियों को कुछ नहीं समझा जाता।” उनका मानना था कि ये जो स्मॉलर ट्रैडीशन है, जो छोटी संस्कृतियाँ है, वे भी सगर्व खड़ी रह सकती हैं। एक तरह से तरुण हिंदी के उत्तरपूर्वी अंग के कवि थे। उनके काव्य में नार्थ ईस्ट का स्वर है; वहाँ के दृश्य, चरित्र, उनकी परंपरा सभी कुछ है।
उनकी कविताएँ इंडियन स्टेट की आलोचना हैं। इंडियन स्टेट के वह बहुत बड़े आलोचक थे। वह यह मानते थे कि जो हमारी राज्य-व्यवस्था है, यही डेमोक्रेसी को बर्बाद कर रही है और फ़ाशीवाद की तरफ़ हमें ले जा रही है। राज्य-व्यवस्था चाहती है कि हम यह सोचें कि हम लोगों में जितनी भी बुराइयाँ हैं, वे समाज में व्याप्त हैं। सांप्रदायिकता, सामंतवाद, हर तरह का अन्याय और पूँजीवादी प्रवृत्तियों सबका आरोप हम समाज के ऊपर डाल देते हैं। हम उसके पीछे की जो पॉलिटिक्स और जो स्टेट फ़ॉर्मेशन है, उसके रोल को नहीं देखते हैं।
सांप्रदायिकता के लिए लोगों को दोषी ठहराना न कि राज्य को और उसके इंस्टीट्यूशन को, उसी तरह पूँजीवाद के लिए उपभोक्तावाद को दोषी ठहराना, जो कि आम बीमारी है न कि पूंजीवादी स्ट्रक्चर को। तरुण अक्सर इन बातों को बड़े प्रोवोकेटिव ढंग से उठाते थे।
तरुण की अंतिम कविता ‘देश’ सिर्फ़ दो पंक्तियों की है, जो उसने छह दिसंबर 2024 के दिन लिखी थी। ये दो अविस्मरणीय पंक्तियाँ हमेशा मेरे दिल में रहेंगी। तरुण ने कविता थोड़ा देर से लिखनी शुरू की थी; संख्या में मेरा अंदाज़ यह है कि 50-60 से ज़्यादा नहीं होगी, एक काम हमारा यह बनता है कि उनकी रचनाओं को संकलित करके एक अच्छी भूमिका के साथ लोगों के सामने लाएँ ताकि ये आवाज़ खो न जाए। तरुण अपनी तरह की यूनिक आवाज़ है। इस आवाज़ को ज़िंदा रखना होगा।
— असद ज़ैदी