संपूर्ण
परिचय
कविता28
गीत25
ई-पुस्तक11
ग़ज़ल1
ऑडियो 1
वीडियो18
पत्र1
आलोचनात्मक लेखन2
निबंध5
उद्धरण14
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के निबंध
साहित्य का फूल अपने ही वृंत पर
कला निष्कलुष है। दुनिया में वह अपना सानी नहीं रखती। साहित्यकार के लिए उसके अपर अंगों के ज्ञान से पहले बोध आवश्यक है। जैसे बीजमंत्र, उसका अर्थ, पश्चात् अनिंद्द सुंदर रूप उसी के फूल की तरह उसके अर्थ के। डेंटल पर खिला हुआ। नया जन्म जिस तरह, एक युग की संचित
साहित्य और भाषा
भाषा-क्लिष्टता से संबंध रखने वाले प्रशन हिंदी की तरह अपर भाषाओं में नहीं उठते। हिंदी को राष्ट्र-भाषा मानने वाले या बनाने वाले लोग साल में तेरह बार आर्त चीत्कार करते हैं—भाषा सरल होनी चाहिए, जिससे आबाल-वृद्ध समझ सकें। मैंने आज तक किसी को यह कहते हुए नहीं
मुसलमान और हिंदू-कवियों में विचार-साम्य
सभ्यता के आदिकाल से लेकर आज तक जितनी बड़ी-बड़ी बातें साहित्य के पृष्ठों में लिखी हुई मिलती हैं, उनके बाह्य रूपों में साम्य न रहने पर भी वे एक ही सत्य का प्रकाश देती हैं। आज तक मानवीय सभ्यता जहाँ कहीं एक-दूसरी सभ्यता से टक्कर लेती आई है, वहाँ उसके बाह्य