पीतांबर हकीम
अषाढ़ का महीना था। पहली बरखा के संपूर्ण लक्षण दिखाई पड़ने, लगे थे। पछवा का ज़ोर रुका और पुरवा का जीवन-स्रोत बह चला। तीतरपांखी बदली उठ रही थी, पर गाँव के किसानों के हृदयों में उमंग की हिलोर न उठी। प्रत्येक की आकृति पर वेदना की घटा छाई हुई थी। बात यह थी