कला में जीवन की अभिव्यक्ति
(एक)
समाज की तरह साहित्य में भी लोकोक्तियाँ बनती जा रही है, जिनमें से यह उक्ति प्राय: सुनाई पड़ती है—‘कला कला के लिए।’ इस उक्ति के आधार पर हमारे यहाँ यह धारणा कुछ-कुछ फैल चली है कि दिन-रात के इस हँसते-रोते विश्व से पृथक् कला कोई भिन्न वस्तु हैं, जिसका