1699 - 1764 | किशनगढ़, राजस्थान
किशनगढ़ (राजस्थान) नरेश। प्रेम, भक्ति और वैराग्य की साथ नखशिख की सरस रचनाओं के लिए ख्यात।
अरे पियारे, क्या करौ, जाहि रहो है लाग।
क्योंकरि दिल-बारूद में, छिपे इस्क की आग॥
इस्क-चमन महबूब का, जहाँ न जावै कोइ।
जावै सो जीवै नहीं, जियै सु बौरा होइ॥
थिर कीन्हेंचर,चर सुथिर, हरि-मुख मुरली बाजि।
खरब सुकीनो सबनि कों, महागरब सों गाजि॥
सीस काटिकै भू धरै, ऊपर रक्खै पाव।
इस्क-चमन के बीच में, ऐसा हो तो आव॥
कहूँ किया नहिं इस्क का, इस्तैमाल सँवार।
सो साहिब सों इस्क वह, करि क्या सकै गँवार॥
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