ललितकिशोरी की संपूर्ण रचनाएँ
दोहा 12
कब कालीदह-कूल की, ह्वै हौं त्रिबिधि समीर।
जुगुल अँग-अँग लागिहौं, उड़िहै नूतन चीर॥
यमुना के कालीदह नामक घाट के किनारे की शीतल, मंद, सुगंधित तीन प्रकार की वायु कब बन जाऊँगा। और वायु बनकर राधाकृष्ण के अंगों का इस प्रकार से कब स्पर्श करूँगा जिससे कि उनके नए वस्त्र उड़ने या लहराने लगें।