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केशवसुत

1866 - 1905 | महाराष्ट्र

केशवसुत की संपूर्ण रचनाएँ

उद्धरण 1

जब कोई अतिथि घर पर आता है तो मैं उससे कह देता हूँ, यह तुम्हारा ही घर है।

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