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Bhushan's Photo'

भूषण

1670 - 1772

रीतिकाल के सुपरिचित कवि। काव्य में वीर रस की प्रधानता।

रीतिकाल के सुपरिचित कवि। काव्य में वीर रस की प्रधानता।

भूषण का परिचय

भूषण के प्रमुख आश्रयदाता महाराजा शिवाजी तथा छत्रसाल बुन्देला थे। मिश्रबन्धुओं तथा रामचन्द्र शुक्ल ने भूषण का समय 1613-1715 ई. माना है। शिवसिंह सेंगर ने भूषण का जन्म 1681 ई. और ग्रियर्सन ने 1603 ई. लिखा है।

भूषणरचित 'शिवराज-भूषण', 'शिवा-बावनी', 'छत्रसालदशक', 'भूषणहजारा', 'भूषणउल्लास' और 'दूषणउल्लास' इत्यादि  छः ग्रन्थ बतलाये जाते हैं। इनमें से तीन ग्रन्थ 'भूषणहजारा', 'भूषणउल्लास' और 'दूषणउल्लास' अभी तक अप्राप्य हैं। 'शिवराज-भूषण' में 384 छन्द हैं। दोहों में अलंकारों की परिभाषा दी गयी है तथा कवित्त एवं सवैया छन्दों में उदाहरण दिए गये हैं, जिनमें शिवाजी के कार्य-कलापों का वर्णन किया गया है। इसका रचनाकाल 29 अप्रैल, 1673 ई. है। भूषण ने 'शिवराज-भूषण' की रचना के विषय में लिखा है ‘सिवचरित्र लखि यों भयो, कवि भूषन के चित्त। भाँति-भाँति भूषननि सों, भूषित करौं कवित्त।‘ स्पष्ट है कि भूषण ने शिवाजी के चरित्र तथा सुकवियों की कृपा से यह अलंकार-ग्रन्थ लिखने की प्रेरणा प्राप्त की थी। इसमें मंगलाचरण, राजवंश, तथा कवि-वंश-वर्णन के अनन्तर अलंकारों के लक्षण और उदाहरण दिए हैं। इस ग्रन्थ में 99 अर्थालंकार, 4 शब्दालंकार, 1 चित्र और 1 संकर को मिलाकर कुल एक सौ पाँच अलंकारों का वर्णन है। इस ग्रन्थ का सबसे कमज़ोर अंश अलंकारों की नामावली है। भूषण ने अलंकारों में उपमा को उत्तम मानकर सर्वप्रथम उसकी चर्चा की है। मतिराम के लक्षणों का भूषण पर अत्यधिक प्रभाव है, कुछ लक्षण तो ज्यों के त्यों ले लिए गये हैं। संस्कृत ग्रन्थों में जयदेव के 'चन्द्रालोक' का भूषण पर सर्वाधिक प्रभाव माना जा सकता है। रीति-ग्रन्थ की दृष्टि से 'शिवराज-भूषण' साधारण रचना है पर उसमें अलंकारों के उदाहरण के लिए शिवाजी के जीवन की प्रमुख घटनाओं, युद्धों एवं शौर्यपूर्ण कार्य-कलापों की झाँकी मिल जाती है। यह वीर-रसप्रधान ग्रन्थ है। इसमें युद्ध-सामग्री का सुन्दर चित्रण हुआ है। भूषण ने गीतिका, दोहा, अमृतध्वनि, छप्पय, मालती, अरसात, किरीट, दुर्मिल, कवित्त, हरिगीतिका आदि छन्दों का प्रयोग किया है। साहित्यिक ब्रजभाषा के साथ फारसी, अरबी, तुर्की, बुन्देलखण्डी, अन्तर्वेदी आदि भाषाओं के प्रचलित शब्दों का भी स्वतन्त्रतापूर्वक उपयोग किया गया है।

'शिवा-बावनी' में कुल 52 छन्द हैं। कवित्त और छप्पय में रचित यह एक मुक्तक रचना है। इस ग्रंथ में शिवाजी के प्रताप, रण-प्रस्थान, युद्ध, तलवार, नगाड़ा, आतंक, तेज, पराक्रम तथा विजय का वर्णन है। इनमें शिवाजी के प्रताप और आतंक के चित्रण बड़े विशद हैं। इस ग्रन्थ में वीर, रौद्र तथा भयानक रसों का सुन्दर परिपाक हुआ है। भूषण ने शिवा-बावनी में शिवाजी के शत्रुओं की दुर्दशा का सजीव अंकन किया है। 'शिवा-बावनी' की भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है। इसमें फ़ारसी, राजस्थानी, बुन्देलखण्डी आदि भाषाओं के प्रचलित प्रयोग भी मिलते हैं। यह रचना साहित्यिक एवं ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से वीर-काव्यधारा की एक अक्षय एवं स्थायी निधि है।

'छत्रसालदशक' में दस छन्दों में छत्रसाल बुन्देला का यशोगान किया गया है। भूषण की सारी रचनाएँ मुक्तक-पद्धति में लिखी गयी हैं। इनकी कविता वीररस-प्रधान है। इसमें चारों प्रकार के वीर, युद्धवीर, दयावीर, दानवीर और धर्मवीर का वर्णन है, पर प्रधानता युद्धवीर की ही है। रौद्र, भयानक, वीभत्स आदि प्रायः समस्त रसों के वर्णन इनकी रचना में मिलते हैं पर उसमें रसराजकता वीररस की ही है। भूषण की शैली विवेचनात्मक एवं संश्लिष्ट है। इन्होंने विवरणात्मक-प्रणाली का बहुत कम प्रयोग किया है। इन्होंने युद्ध के बाहरी साधनों का ही वर्णन करके सन्तोष नहीं कर लिया है, वरन् मानव-हृदय में उमंग भरने वाली भावनाओं की ओर उनका सदैव लक्ष्य रहा है। इनकी कविता में ओज पर्याप्त मात्रा में है। प्रसाद का भी अभाव नहीं है। 'शिवराजभूषण’ के आरम्भ के वर्णन और शृंगार के छन्दों में माधुर्य की प्रधानता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भूषण-रचित वीररस के उद्गारों को सारी जनता के हृदय की संपत्ति बताते हुए इन्हें ‘हिंदू जाति का प्रतिनिधि कवि’ कहा है। यह स्पष्ट है कि भूषण वीरकाव्य-धारा के जगमगाते रत्न हैं।

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