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ससन-परस खसु अंबर रे

sasan paras khasu ambar re

विद्यापति

विद्यापति

ससन-परस खसु अंबर रे

विद्यापति

ससन-परस खसु अंबर रे देखल धनि देह।

नव जलधर-तर चमकए रे जनि विजुरी-देह॥

आज देखलि धनि जाइते रे मोहि उपजल रंग।

कनक-लता जनि संचर रे महि निर अवलंब॥

ता पुन अपरुब देखल रे कुच-जुग अरबिंद।

बिगसित निह किछु करन रे सोझाँ मुख-चंद॥

विद्यापति कवि गाओल रे रस बुझ रसमंत।

देवसिंह नृप नागर रे हासिनि देइ कंत॥

हवा लगी तो कपड़े सरक गए। मैंने सुंदरी की देह देख ली। ऐसा लगा कि नए बादल की ओट में बिजली की लकीरें जगमगा उठी हैं। मैंने आज उसे राह में देखा। मेरे अंदर अनुराग उमड़ आया। मुझे लगा, बिना किसी सहारे के, धरती पर कनकलता टहल-बूल रही है। फिर एक बात यह भी अनोखी देखी कि दोनों उरोज उरोज नहीं थे, कमल थे। मगर वे खिले क्यों नहीं थे? इसलिए नहीं खिल पा रहे थे कि सामने पूरा चाँद-मुखड़ा था। विद्यापति ने गाया—“रसिक जन ही इसका मर्म समझेंगे। हासिनी देवी के प्राणवल्लभ राजा देवसिंह बड़े रसिक हैं।”

स्रोत :
  • पुस्तक : विद्यापति के गीत (पृष्ठ 25)
  • रचनाकार : विद्यापति
  • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
  • संस्करण : 2011

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