केदारनाथ अग्रवाल का रामविलास शर्मा के नाम पत्र
kedaranath agarwal ka ramawilas sharma ke nam patr
केदारनाथ अग्रवाल
Kedarnath Agarwal

केदारनाथ अग्रवाल का रामविलास शर्मा के नाम पत्र
kedaranath agarwal ka ramawilas sharma ke nam patr
Kedarnath Agarwal
केदारनाथ अग्रवाल
और अधिककेदारनाथ अग्रवाल
बांदा
2-11-43
प्रिय शर्मा,
पत्र मिल गया पर लखनऊ न आ सका। क्योंकि फिर से ज्वर महाराज ने चार दिन तक कृपा कर दी थी। आज अभी तक बचा हूँ—शाम की राम जाने। पर विश्वास है कि मरूँगा नहीं। काम काफ़ी करना है।
मेरी पुस्तक तैयार है। निराला जी ने कहा था कि वह युग मंदिर से छपवाएँगे। क्या यह उचित होगा? कुछ Payment हो जाए तो अच्छा है। पर इसकी चर्चा नहीं की। यदि तुम कोई प्रकाशक तय करो तो उसे दूँ पर पेमेंट कराना। Dedicate तुम्हें हुई हैं। लाजवाब पुस्तक है दोस्त। तुम्हारे छमाही प्रकाशन1 के लिए भी कई रचनाएँ (तुकांत) तैयार कर ली हैं। मेरी समझ में वे अपनी ही चीज़ें हैं—ख़ूब हैं। तुम्हें भेजूँगा जैसे ही ताक़त आई। स्केच भेजूँगा। एक गांधी पर किसान की दृष्टि से लिखी है। 100 पंक्तियाँ अतुकांत हैं दूसरी किसान पर है—क़रीब उतनी ही।
तुम्हारा
केदार
बांदा
11-11-43
प्रिय शर्मा,
मेरी पुस्तक—पहला कविता संग्रह—तयार [तैयार] है पांडुलिपि के रूप में। तुम्हें देखने को भेजूँगा तुम्हारा उत्तर आते ही। उसकी रूपरेखा देखना।
यह [ये] कई रचनाएँ भेजता हूँ—जो अच्छी लगें छमाही प्रकाशन के लिए रख लेना। जो न जँचे उन्हें ‘हंस’ में न देना क्योंकि दूसरा संग्रह अप्रकाशित कविताओं का निकलवाना चाहता हूँ। इन रचनाओं पर अपनी राय भेजना।
निराला पंत—महादेवी के Sketches ही तैयार कर सका हूँ—कहो तो भेजूँ। उत्तम ही हैं। नई दृष्टि की नई ज़बान है।
कोई प्रकाशक मेरे पहले संग्रह के लिए खोजे। मैं मूल्य लूँगा अवश्य। मुफ़्त न दूँगा। यह समझे रहना।
तुम Talk Radio में सुनूँगा 15-11-43 को दिल्ली से।
क्या तुम लखनऊ दिवाली में आए थे? मैं नहीं जा सका।
आजकल श्रीमती जी वहीं हैं। अकेला हूँ इसी से साहित्य लिख-पढ़ लेता हूँ। कुशल है। स्वस्थ तो क्या हूँ पर चल फिर लेता हूँ।
तुम्हारा
केदार
बांदा
5-12-43
प्रिय शर्मा,
मैंने तो तुम्हें लंबा पत्र लिखा और भेजा, तुमने एक छोटा-सा ‘टुटुरुँ टू’ पोस्टकार्ड ही मेरी ख़िदमत में पेश किया। मैं नहीं जानता कि सिवाय साहित्यिक ज़बान में तुम्हें गाली दूँ और क्या कहूँ। कविताएँ नहीं अच्छी लगी, जाने भी दो। दोस्त! ख़त को तो बसंत की बहार से भर देते। लिखने वाले साले लिखा ही करते हैं पर बेचारों की दो ही तीन चीज़ें पूरी उतरती हैं। मैं तो क़लम पकड़ना सीख रहा हूँ। मुझे तुम्हारे विचार बिल्कुल बुरे नहीं लगते। हाँ, इतना ज़रुर कहूँगा कि इन कविताओं को भी एक प्रकार के पाठक बेहद पसंद करते हैं। मैं उन्हीं का कवि हूँ—सब का कवि नहीं। दो रचनाएँ और भेजता हूँ; चाहे जिसमें छाप लो, पर राय देना ज़रुर।
रही बात Free Verse की—यह मुझे मेरी जान ही मालूम होती है। जो चाहता हूँ वही उन शब्दों में कह लेता हूँ—ऐसा नहीं होता कि लिखने कुछ बैठूँ और तुकांत के दाँव-पेंच में पड़कर कुछ दूसरा ही लिख डालूँ। मेरा ऐसा अनुभव है कि तुकांत में यही होता है। उसमें मेरी हत्या होती है। Free Verse में मैं पनपता हूँ। मुझे तुम्हारी सलाह तुकांत में लिखने की पसंद है पर ग्राह्य नहीं है। मैं उसे ग्रहण तो तब करुँ जब वह मुझे धोखा न दे। वह दग़ाबाज़ है। वह केदार को नहीं, साहित्यिक मानव के पुरातन भावों को ही शब्दों के गर्भित अर्थ गौरव से प्रकट करना जानती है। मुझे Free Verse का माध्यम जानदार और ज़ोरदार मिला है। यह पिटा-घिसा नहीं हैं। न इसमें पंक्ति के अंतिम भाग का एक-सा अवसान है। यहाँ प्रवाह है, रोज़ की बोली का सजीव रुप है। शर्मा मेरी राय मानो तो तुम मुझे तुकांत लिखने की यह सलाह न दो। मैं तुम्हारा केदार हूँ। वैसे तो मैं मानूँगा नहीं, पर तनिक और सोच लो। लोग गधे होते हैं—हरामज़ादे होते हैं, उन्हें तो तुम जितने घूँट जैसा पानी पिलाओगे वह उतने घूँट वैसा पानी पिएँगे। उनकी ख़ुद की रुचि ही क्या है। वह लेखक की क़लम के साथ नाचते हैं। ताब भर हो मेरी क़लम में मैं तो उन्हें ऊबने न दूँगा ऐसे तरीक़े से लिखूँगा जो नई होंगी। मैं पुराना तरीक़ा आने ही नहीं देता। साँस का ज़ोर पंक्तियों में आवे, मेरी यह साधना है। जिन लोगों को तुम कहते हो कि ऊब गए हैं Free Verse से, वे लोग ही कौन हैं? तुम्हारे घनचक्कर साहित्यिक होंगे। नए साहित्य की सृष्टि अतुकांत मुक्त छंदों के प्रवाह में है, मैं यही देख रहा हूँ। जब दुनिया वाले तुकांत छंदो को युगों से घोखते रहने पर भी आज तक नहीं ऊबे, तब भला वे इस कुछ काल की अतुकांत Free Verse से कैसे ऊब सकते हैं! वह जब इसी के आदी हो जावेंगे तब इसका स्वागत करेंगे, अभी उनकी सब भावनाओं का प्रकटीकरण नहीं है, इसी से इस Free Verse से बिचकते हैं; जैसे मेरा बूढ़ा बैल नेता लोगों को देख कर बिचकता है। फिर यह तो Free Verse की मुठभेड़ है, तुकांत की जीत नहीं हो सकती, अपनी लंबी चौड़ी टाँगों और मज़बूत कलाइयों का पूरा ज़ोर Free Verse गोलमटोल तुकांत के शरीर पर अजमावेगा और ख़ून निकाल लेगा। Free Verse की कविता नए दृष्टिकोण की कविता है। वह केवल कल्पना की परी के उरोज़ों पर चढ़ी चोली अथवा भावुक नासिका की टाट पर बैठने वालों की सोहबत में रहने वालों की, ऊबड़-खाबड़ देह की एक मात्र मज़दूरिन है। उसे नफ़ासत की उँगलियाँ कैसे छू सकती हैं। सभ्य समाज के पोषक उसे कैसे पास बुलाकर निहार सकते हैं। वह साहित्य में ‘भदेस [पन]’ में ख़ून की लाली है, गर्मी है और ताक़त है। शर्मा तुम न ऊबो, और सालों को ऊबने दो। मैं गाली इससे देता हूँ कि वह [वे] तुम्हारा स्वाद बिगाड़ रहे हैं। तुम पूरे ‘साधु’ (साहित्यिक) होते जा रहे हो, यह प्रगति तुम्हें बहका रही है। जानते हो दुनिया उसी की है, जिसका हथियार (चाहे वह जिस प्रकार का हो) गहरा घाव करता है। मैं सोचता हूँ तुकांत काम कर चुकी। नई दुनिया के बाशिंदों को वह चीज़ नहीं दे सकती—वह निकम्मी और कायर है। तुम कहोगे संसार की तुकांत कविता ने ही संसार बदला है, रंग जमाया है। सत्य, मैंने ग़लत कहा भूतकाल का अनुभव मात्र है। जब संपूर्ण राज्य व्यवस्था ही उलट-पुलट रही है, हँसिया-हथौड़ा की हड्डी-पसलियाँ नव निर्माण कर रही हैं, तब क्या यह संभव नहीं है कि पुरानी कविता की ‘तरकीबें’ भी रद्द कर दी जाएँ और नई निकाली जाएँ। तुकांत कविता एक फल का चाक़ू जैसी है। अतुकांत Free Verse सौ लाख फलों जैसी है।
दोस्त, तुम यह न सोचना कि मैंने यह सब अपनी कविता के Defence में लिखा है। यह मेरे साथ अन्याय होगा क्योंकि मैं तुम्हारे साथ यह ‘कपट’ नहीं कर सकता। मैं अपनी कविताओं की कमज़ोरियाँ मानता हूँ—मैं प्रयत्न करता हूँ कि ज़ोरदार चीज़ें दूँ। तुम्हें क़ायल कर दूँ। पर यह ज़रुर है कि जहाँ सब उस तरह लिखते हैं, मुझे मेरी तरह ही लिखने दो। मेरा यह Experiment है। इसे बीच में ही न बंद करने को कहो। यदि सफल हुआ तो हिंदी का फ़ायदा है। यदि न हुआ तो नुक़सान नहीं है। तुम्हारी बात मान जाऊँगा।
शायद तुमने देखा होगा कि छंद वाली कविता ग्राम्य कंठ से नहीं निकलती। उसमें Free Verse ही रहता है। मैं शहरी गवैयों या गज़ल गाने वालों की बात नहीं कहता, न आल्हा या ब्रजवासी गाने वालों की बात कहता हूँ। ये कवियों की कृतियों के मौखिक अनुकरण हैं। जब पिसनहारी गाती है, तो साँसे लंबी-छोटी चली हैं Free Verse में। ख़ैर...
कहो; क्या बड़े दिन में इधर आओगे? सख़्त ज़रुरत है तुम्हारी। मैं कोशिश करने पर भी शायद प्रयाग न आ सकूँ—यदि तुम न आओगे तो सूचित करने पर फिर मैं ही प्रयत्न करुँगा। तुमसे मिलना है। नागर ने लिखा है कि तुम प्रयाग आओगे। कृपया मुझे भी इत्तला दो सही-सही। तुम नियत तिथि पर पहुँचते।
मैं कोई Controversy नहीं Raise कर रहा। किंतु तुमसे अपने विचारों पर प्रकाश चाहता हूँ। केवल उनकी कमज़ोरी या मज़बूती नापना चाहता हूँ। मेहरबानी करके मुझे Convince कर दो।
तुम्हारा नाटक2 पढ़ा। ख़ूब पसंद आया। उसे एक दिन बड़े दिन में घर में खेल कर देखूँगा। अशोक साहब3, कुछ कविताएँ तो आपकी जमी।
तुम्हारा
केदार
8-12-43
फ्रीवर्स मेरी जान!
जीते रहो। पत्र पढ़ा। तबीयत ख़ुश हुई। उससे भी ज़्यादा ‘स्वप्नद्रष्टा’ कविता से। मैंने हंस में भेज दी है। बहुत सुंदर है, बधाई। तुम्हें इतने से संतोष न होगा। और सुनो छंद के प्रवाह में गंभीरता है। मंथर गति से चलता हुआ स्वप्न द्रष्टा को ख़ूब कोसता है। क्या सादगी से तुमने उसे गरियाया है। ज़िंदगी की भीड़ में कंधा रगड़ने और चलने से परे हो। यह पिसनहारियों की आवाज़ है या केदार की? सिर्फ़ निराला जी ने इस सादगी से लिखा था—“जब कड़ी मारें पड़ीं दिल हिल गया।” लेकिन क्या ज़बरदस्त हथौड़े की चोट है इस लाइन में यार!
यह कविता इसलिए अच्छी है कि कहने का ढंग सादा लेकिन पुरजोश और बात भी कहने लायक है। तुकांत और अतुकांत की—म्याँ, जिन्ना का गाना भी तुकांत है। लेकिनमैं उसके लिए धेला भी देने को तैयार नहीं हूँ। चूरन वालों का लटका, कोई भी बात तुक की नहीं, जोश नहीं; तुम्हें बंगाल की सब बातों की पूरी जानकारी भी नहीं।
तो फ्रीवर्स मेरी जान! तुम फ्रीवर्स लिखो। पिसनहारियों की तरह स्वर को घटाबढ़ा कर लिखो। और जिन्ना के गाने मत लिखो। जैसे पहले गीत भेजे थे, वे भी 3/10 ही हैं। इनसे चंदगहना किस भकुए को ज़्यादा पसंद न होगी।
मेरी बात समझो प्यारे! स्वप्नद्रष्टा और जिन्ना का गाना... दोनों तुकांत; लेकिन पहली कविता 10/10 तो दूसरी बेतुकी है। चंदगहना और किसान... दोनों अतुकांत। लेकिन चंदगहना 1/10 है और किसान 4/10 ।
एक दूसरे ढंग की तुकांत रचनाएँ कोयले, काटो-काटो करवी है। दोनों 11/10 ! क्या समझे?
तुम कविताएँ 9/10 और 11/10 के बीच की लिखो चाहे तुकांत हों चाहे अतुकांत। तुमसे एक चंदगहना पाने के लिए तुम्हारे वे गीत सब 10-20 जितने हों दे सकता हूँ। और “काटो काटो करवी” में जो किसानपन है ‘किसान’ में नहीं आ सका।
जानता हूँ कि हमेशा 9/10 और 11/10 नहीं मिल सकते। असंभव है। लेकिन आदर्श वही होना चाहिए। तुम मेरे कहने से कुछ लिखने लगो, यह तो अन्याय हो गा, दोनों के साथ। तुम अंचल नहीं हो।
मेरी राय एक दोस्त की राय है। उसे सुनो; झगड़ो। करो हमेशा वही जो जचे। कलाकार की यही परख है। और समझदार की यह कि औरों की भी सुने।
पहले यह विश्वास कर लो कि चंदगहना और यह धरती है उस किसान की जैसी कविताएँ मुझे बेहद पसंद हैं। तुम ख़ूब लिखो। लेकिन काटो काटो करवी भी उतनी ही पसंद है।
तुकांत लिखने की सलाह का यह मतलब नहीं है कि अतुकांत लिखना छोड़ दो। तुकांत लिखने को क्यों कहा था? इसलिए नहीं कि साहित्यिकों की आलोचना से, प्रगतिवाद से, प्रभावित हो गया हूँ। वरन् इसलिए कि तुम्हारी रचनाओं का भेदसपन भदेसी भाइयों की समझ में तब ज़्यादा आ सकता है जब उनके लिए सुगम छंदों की राह से उन तक पहुँचो। क्या तुम समझते हो कि भदेसी भाई जिनके हृदय की बात तुम उन्हीं की बोली में कहते हो, तुम्हारे मुक्त छंद को तुम्हारी तरह पढ़ सकते हैं? मुक्त छंद को पढ़ने के लिए Rhythm का ज्ञान, एक Literary Culture की ज़रूरत होती है। मुक्त छंद भदेस नहीं है, वह एक Literary माध्यम है। भदेसी भाइयों को पढ़ा कर देखो। तुम्हारी बातें किसान हृदय की होती हैं। बोली में वही सरलता होती है। फिर किसान के लिए छंद की रुकावट क्यों हो? उसके लिए ऐसा लिखो कि हल जोतते करवी काटते वह गुनगुना सके। तुम्हारा गीत उसके जीवन को ही न व्यक्त करे, उसे नया जीवन भी दे। मुक्त छंद में भदेसपन पूरा नहीं होता। इसकी एक ही कसौटी मैं जानता हूँ—भदेसी भाइयों को सुनाकर देख लो। जो Intellectuals declassed हो कर उनकी तरफ़ जा रहे हैं, वे भी तुम्हारे ‘काटो काटो करवी को ही ज़्यादा गुनगुनाते हैं।
केवल Free verse में हम तब लिखें गे जब भदेसी भाइयों को सुनाने की, उन्हें ये कविताएँ सिखाने की ज़रूरत न होगी। केवल तुम किसान से खड़ी बोली में बात कर सकते हो। उसी के ढंग से अपनी बात कह सकते हो। मैं चाहता हूँ, नव शिक्षित और अशिक्षित किसान तुम्हारी कविता पढ़ कर कहे, यह मेरे भाई ने लिखी है। मेरी ही बात कही है। उसे याद कर ले और अपने भाइयों को सुनाए। उसकी राय मेरी राय से बहुत महत्वपूर्ण होगी।
लेकिन ज़ोर नहीं, ज़ब्र नहीं, क़तई नहीं। सिर्फ़ प्यार। तुम जो कुछ भी लिखो सिर माथे पर।
तुम्हारा
रामविलास
बांदा
17.12.43
प्रिय शर्मा,
तुमने ऐसा धोखा दिया कि कुछ कहते नहीं बनता। तुम्हें सभापति बनाता। तुम मौक़ा नहीं देखते। अवसर खो देते हो। बेचारा नागर इंतज़ार करते-करते मर गया। ख़ूब गालियाँ दी हैं मैंने। रेडियो वाला Programme क्या हुआ, आफ़त हो गया।
आशा है तुमने College Join कर लिया होगा।
सम्मेलन अच्छा रहा। सब काम सुचारु रूप से समाप्त हो गया।
तुमने हंस में मेरी कविताएँ जो छापी हैं उनमें परिवर्तन कर दिया है। यह बहुत ही अच्छा हुआ। मैं तुम्हें किन शब्दों में धन्यवाद दूँ। रेडियो की पत्रिका में तुम्हारा लाहौर का यथार्थवाद पर ब्राडकास्ट छपा है—मेरा उल्लेख है। धन्यवाद। कृपया “भारतेंदु युग” भिजवाना। दिवाली में लखनऊ जाना चाहता हूँ। क्या तुम आओगे?
Prose में Sketches लिखना शुरू किया है। हंस में दूँगा। तुम्हारा भी एक होगा। अभी pts. jot कर लिए हैं। छोटे-छोटे होंगे। वह भी Personal होंगे। राय देना जब छपने पर पढ़ना। योग्य सेवा लिखना। निराला जी उन्नाव गए। इस बार निराला जी ने मेरी तारीफ़ के पुल बाँध दिए यहाँ। क्या बात है? मैं इस योग्य तो था नहीं। बुख़ार से उठा हूँ—कमज़ोर हूँ। नहीं तो और लिखता।
तुम्हारा
केदार
बांदा
10.2.44
प्रिय शर्मा,
तुम्हारा [कार्ड] परसों दस बजे मिल गया था। इसी से दो कविताएँ नक़ल करके तुरंत ही तुम्हारे पास भेज रहा हूँ—किंतु वही अतुकांत हैं। शायद तुम पसंद करो बहुत ज़ोरदार तो नहीं है फिर भी नए touches ज़रूर हैं। लिखना कैसी हैं। दोस्त यदि हो सके तो एक दिन को आगरे आऊँगा। 27 के इधर-उधर—अकेले या बहन के साथ। ठहरूँगा तुम्हारे ही पास। केवल तमसे मिलता है। कहो घर का पता क्या है! जल्दी ही भेजे। क्योंकि मुझे तुम्हारा पत्र मेरठ जाने से पहले ही मिल जाना चाहिए।
शेष कुशल है।
कानपुर में कोई प्रगतिशीलों की बैठक क्राइस्ट चर्च में हो रही है। पत्र आया था। मैं इंकार कर दिया है क्या बात है?
शायद बीबी [बीवी] बच्चे आगरे पहुँच गए हैं इसी से एक पंक्ति के [का] पोस्ट कार्ड भेजा है आपने। मैंने भी सोचा था कि केवल कविताएँ भेजूँ—कुछ भी और न लिखूँ।
इधर कोई Radio Talk नहीं हो रही है?
तुम्हारा ही
केदार
बांदा
20.2.44
प्रिय शर्मा,
मैं बांदा से 26.2.44 को रात को चलूँगा और निश्चित रूप से आगरा 27.2.44 को तुम्हारे घर पहुँचूँगा। राजा मंडी उतरूँगा। संभवतः वहाँ से तुम्हारा घर निकट ही होगा। हंस मिला। कविताएँ देखीं। तुम से बात करूँगा। मैं सानंद हूँ। निराला जी का पत्र आया है वे सानंद हैं।
तुम्हारा
केदार
Civil Lines, Banda (U.P.)
26.3.44
प्रिय शर्मा,
मैं दौरे से आज ही वापस आया हूँ। मनीआर्डर की रसीद से पता चलता है कि तुम्हें 11/- रु० मिल गए हैं। दस्तख़त तो तुम्हारे ही हैं।
‘प्रात के शर’ के छपाने की बात किताब महल प्रयाग वालों से हो रही थी। वह मुझे रुपया लगाकर, 2/8 Per Page 1000 कापी के भाव से, सौदा तय करना चाहते हैं और मुझे 33.1/3% Royaltyदेंगे। आज ही मैंने उन्हें सूचित कर दिया है कि यह असंभव है। मेरे साले और मित्र मिस्टर सीताराम नैनी वाले पांडुलिपि माँगते हैं। मैं इन्हें भेजने वाला हूँ। वे छपाने का विचार ज़ोर से कर रहे हैं, किंतु पता नहीं वह बिचक न जाएँ। मौक़ा आया है भेज कर देखूँगा। तुम्हारी क्या राय है?
निराला जी को भी पत्र भेज रहा हूँ कि वह पांडुलिपि ले लें किताब महल वालों से।
तुमसे लाई पुस्तकें पढ़ी हैं, ख़ूब हैं। एक “पाकिस्तान” पर कविता भी लिखी है। उत्तर आने पर ही भेजूँगा।
तारसप्तक में तुम्हीं सबसे ऊँचे हो। सब रचनाएँ पकी और ए० क्लास हैं। रोज़ पढ़ता हूँ। मालकिन को नमस्कार—बच्चों को प्यार।
तुम्हारा
केदार
बांदा
11.4.44
दोस्त,
मुझे अफ़सोस है कि अपने चाचा के कारण से मैं प्रयाग उस समय न पहुँच सका जब तुमसे मिल सकता। अब गया और कल ही वापस आया हूँ। सब हाल नागर ने मुझे बताया।
मुझे ख़ुशी इस बात की है तुमने उस फ़िराक़ को ख़ूब मारा बातों से। मैं होता तो मैं भी दुलत्तियाता [,] वह इसी के योग्य है।
अपना संग्रह “निराला” जी के पास छोड़ आया हूं। नाम “प्रात के शर” रखा है। कैसा है? समर्पित तुम्हें ही किया है—आशा है तुम स्वीकार करोगे। नरेंद्र की तरह मैंने तीन को एक साथ भवसागर से पार नहीं उतारा।
वीरेश्वर की ‘दिल्ली अब भी दूर है’ छपाना। ख़ूब मज़े की है। न छपाना तो उसे वापस कर देना ताकि वह कहीं और छप जावे।
तुम्हारा पिछला पत्र इतना सुंदर है कि मैं बिक गया। अंतिम वाक्य बार बार याद करता हूँ। शर्मा तुमने जादू कर दिया है।
नया कुछ नहीं लिखा, वरना भेजता। तुमने मेरी बेहद तारीफ़ प्रयाग में कर रखी है। यह क्यों, समझ में नहीं आता।
जनाब अशोक से इस्तेदुआ हुआ है कि जरा कलम मनमानी न रगड़ें बल्कि ज़ोरदार करके चलावें।
तुलसीदास पर बहस सुनी [।] ख़ूब अंत किया तुमने। अब लौं नसानी अब न नसैहों। व्यंग्य गुलाब जी के ख़ूब चिपका। तुम्हारी भी समझ में प्रेम नहीं आता, मेरी भी समझ में नहीं आता।
कुशल से हूँ तुम वीवी [बीवी] बच्चों के साथ हो अथवा अकेले ही डंड पेलते हो।
आगरा के ताजमहल के संगमरमर अपर अपना हाथ फेरना चाहता हूँ और मुमताज की शीतलता को गरमाना चाहता हूँ। न जाने कब और कैसे यह हो सकेगा।
तुम्हारा
केदारनाथ
बांदा
11.8.44
प्रिय शर्मा,
आज झाँसी स सम्मेलन का निमंत्रण आया है। उसके देखने से पता चला कि तुम अवश्य 31.8.44 को झाँसी से होओगे। यदि अनुचित न समझो और अवकाश हो तो एक दिन के लिए बांदा आ जाओ। मैं किसी तरह भी झाँसी नहीं पहुँच सकता। कारण मेरा केस 28 से 31 तक को लगा है। बड़ी मुसीबत है।
हंस मिला। मेरी कविता मलखान सिंह सिसौदिया के नाम दे दी है। यह शायद प्रेस की असावधानी होगी।
पत्र शीघ्र ही देना अभी समय पर्याप्त है। आशा है कि तुम यहाँ आओगे ही। एक कविता बंगाल पर लिखी है। जब आओगे तभी दिखाऊँगा। उम्दा है।
सुमन को पत्र भेजा था—उत्तर नहीं आया। वह तो झाँसी आवेगा ही। सूचित करना।
तुम्हारा
केदारनाथ अग्रवाल
बांदा
11.9.44
प्रिय शर्मा,
पत्रों के पढ़ने से पता चला कि हैजे की वजह से झाँसी में सम्मेलन की मनाही कर दी गई है यह अच्छा नहीं हुआ। कोई दूसरा अवसर देखा जाएगा। अब तुम क्यों झाँसी के बहाने बांदा आओगे? न मेरे पत्र का उत्तर ही तुमने दिया। बंगाल पर दो रचनाएँ लिखी हैं उत्तर मिलने पर भेजूँगा। परसों से बुख़ार आ गया है पर precaution ले रहा हूँ।
नागर का उत्तर आया था, असका जवाब दे रहा हूँ।
तुम्हारा
केदार
बांदा
15.9.44
प्रिय शर्मा,
तुम्हारे दोनों पोस्टकार्ड ठीक समय पर आ गए थे किंतु मैं एक केस में चरखारी गया था इससे उत्तर विलंब से दे रहा हूँ। माफ़ करना।
भूखा बंगाल एक अतुकांत मुक्त छंद की रचना भेज रहा हूँ। अपनी राय अवश्य लिखना। मैं उत्सुक हूँ। पाकिस्तान वाली रचना कहीं रखी है खोजने पर भी नहीं मिली इससे अभी नहीं भेज सकता। वह कोई ख़ास नहीं थी...Communistic Song था। मिलने पर भेजूँगा।
बांदा आओ और बिना किसी काम के। दशहरे में ही सही। चित्रकूट चलेंगे। Poems की उम्दा पुस्तकें भिजवाओ। मैं चाहता हूँ कि उम्दा लिखूँ।
वीरेश्वर परेशान हैं बच्चों की बीमारी से। क्या कहूँ उनसे?
पुस्तकें ओ तुमने कहा था और नागर ने भेजी हैं मैंने पढ़ ली हैं। कुछ तो पहले ही पढ़ चुका हूँ।
Review करके भी भेजना है हंस में। जन प्रकाशन की पुस्तकों की।
सानंद हूँ। तुम भी लिखना। मालकिन4 को नमस्ते। बच्चों को प्यार।
तुम्हारा
केदारनाथ अग्रवाल
बांदा (U.P)
विजय दशमी
Dated 26.9.1944
प्रिय शर्मा,
भूखा बंगाल कविता भेज ही चुका हूँ। पहुँच ही गई होगी।
मेरा [मेरे] कविता संग्रह का प्रकाशन निन्यानवे फ़ीसदी संभव हो गया है। एक आर्टिस्ट भी चित्रित करने को मिल गए हैं। विश्वास है कि संग्रह सुंदर निकलेगा। प्रकाशक मेरे संबंधी और मित्र नैनी बी=वाले श्री सीताराम जी हैं। उन्हें काला से प्रेम है। उन्होंने स्वयं मुझसे मेरी कविताओं के प्रकाशित होने के बारे में चर्चा की थी। इसी से मैंने अपनी पांडुलिपि उनके पास भेज दी है। आज ही उनका पत्र आया है कि मैं तुम्हारा एक उत्तम चित्र शीघ्र ही भेज दो ताकि मैं उसे उनके पास भेज दूँ। वह Block बनाने वगैरह को दे दें। पुस्तक तुम्हीं को समर्पित है।
मालुम होता है तुम बांदा न आओगे। दिल्ली में ही अ जाओ।
बीबी [बीवी] लखनऊ जाने वाली है। तब कहीं फिर कविता और कहानी के पिच्छे पड़ूँगा अभी तो वकालत और श्रीमती से घिरा रहता हूँ। बच्चों को प्यार। मालकिन को सादर नमस्ते। चौबे कहाँ है?
पत्र व फ़ोटो भेजो।
तुम्हारा
केदार
6/10/44
My Dear Kedar,
Got your [Letter] after coming from Lucknow. Dedication to me wrong. I have already dedicated one to you. This mutual respect quite wrong. Send the msg. [manuscript] to me if possible before sending to press. Take suggestion from as many friends as possible. I offer my self as one.
Yours
Rambilas
- पुस्तक : मित्र संवाद (पृष्ठ 68)
- रचनाकार : केदारनाथ अग्रवाल
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