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यह हाहाकार का समय है

ye hahakar ka samay hai

रमेश प्रजापति

रमेश प्रजापति

यह हाहाकार का समय है

रमेश प्रजापति

और अधिकरमेश प्रजापति

    अजब विडंबना है यह कि

    सब कुछ हमारे विरूद्ध घट रहा है

    और हम समर्थन में सिर झुकाएँ खड़े हैं

    सत्ता भूल चुकी कि

    जब भी उसकी चूलें डगमगाती हैं

    तो सबसे पहले क़लम ही उसे सहारा देती हैं

    इस उर्वरा भूमि पर

    ये ज्ञान की कौन-सी उलटी गंगा बह रही है

    कि जो पक्ष में नहीं बोलता

    उसकी पीठ पर सत्ता का चाबुक पड़ता है

    कुछ चारण सच को धता बताकर

    सत्ता के तलुवे चाटने में लगे हैं

    कुछ बेवजह विकास का ढोल पीट रहे हैं

    दर्द से दम घुटा जा रहा है

    और मुक्ति के गीत गाएँ जा रहे हैं

    हम ऐसी जाति-धर्म की जंजीर में जकड़े हैं

    जिसने हमें गूँगा-बहरा बना दिया है

    सोचने की क्षमता निष्क्रिय कर दी है

    जबकि हँसने की कोई वजह

    दिखाई नहीं देती दूर-दूर तक

    फिर भी हम खिसयानी हँसी हँस रह हैं

    देश के हालात से बे-ख़बर जनता को

    फ्री इंटरनेट के जाल में उलझाकर

    सत्ता अपना उल्लू सीधा कर रही है

    रोज़गार की परवाह करके

    देश का युवा मस्त है

    पस्त है

    दूर से आएँ मज़दूर

    देश की राजधानी के जंतर-मंतर पर पर बैठे

    अपने विकटतम दिनों में डूबे हैं

    किसान अपनी फसल के उचित मूल्य के लिए

    संसद का मुँह ताँक रहे हैं

    हसिएँ और दराँती अँधेरे कोने में पड़े

    जंग खाएँ हाँफ रहे हैं

    जो नए विशालकाय पेड़ के तले

    छाँव की उम्मीद में खड़े हैं

    वे नहीं जानते कि यह पेड़

    उनके हिस्से की नमी सोखकर खड़ा है

    बगीचे में फूल खिले हैं

    मगर ऋतुओं के चेहरे पर उदासी है

    मेरे मज़दूर भाइयो!

    तुम्हारे चिंता भरे चेहरे पर

    जिन लाल फूलों को खिला देखना चाहता हूँ

    उन फूलों की रुत

    जाने धरती के किस कोने में बेसुध सोई पड़ी है

    दिन-प्रतिदिन हमें ऐसी अँधी खाई में धकेला जा रहा है

    जहाँ सुनहरा कुछ भी नहीं है

    विचारों पर बर्फ़ ज़मी है

    नए सम्राट के महान अर्थशास्त्रियों ने

    विकास और रोटी की गुत्थी सुलझा ली है

    नया राष्ट्रवाद का पोस्टर

    जनता के माथे पर चस्पा कर दिया गया है

    दरअसल वे इस उर्वरा धरती पर

    अपनी विचारधारा के बीज बोना चाहते हैं

    जिसमें किसान-मज़दूर के लिए कोई जगह नहीं

    एक धर्म को दूसरे धर्म के विरोध में खड़ा करना चाहते हैं

    उन्हें आदमी से ज़्यादा धर्म की चिंता है

    वे ऐसी घोषणाओं का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं

    जिस पर चढ़ते-चढ़ते ज़रुरतमंदों की कमर झुक जाती है

    यहाँ तालाब में गंदगी भर चुकी है

    और आदमी की संवेदना को चूसकर

    उसमें लिजलिजी जोंकें गिजगिजा रही हैं

    यह हाहाकार का समय है

    जहाँ कुछ भी मनुष्य के पक्ष में घटित नहीं हो रहा है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रमेश प्रजापति
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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