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स्वतंत्रता देवी की स्तुति

swtantrta dewi ki istuti

सुब्रह्मण्य भारती

अन्य

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सुब्रह्मण्य भारती

स्वतंत्रता देवी की स्तुति

सुब्रह्मण्य भारती

और अधिकसुब्रह्मण्य भारती

    छोड़ भवन सुखमय, कठोरतम—

    कारावास भुगतने पर भी।

    खोकर यश, ऐश्वर्य, घृणा—

    निंदा का पात्र बनूँ मैं तब भी।

    कोटि कष्ट सहते-सहते ही—

    मैं विनष्ट हो जाऊँ फिर भी—

    हे स्वतंत्रते! भूल सकता—

    नमस्कार करना तुम्हें कभी॥1॥

    कृपापात्र जो नहीं तुम्हारा—

    अद्वितीय धनवान क्यों हो।

    विद्या-बुद्धि समन्वित नाना—

    शास्त्रज्ञान में दक्ष क्यों हो।

    अगणित महिमा लिए हुए वह—

    महान अति महान हो फिर भी

    उसका जीवन उस शव-सा—

    जो सुंदर आभूषण पहने हो॥2॥

    वह भी कोई देश, जहाँ पर—

    दिव्य ज्योति तेरी पड़ी नहीं।

    जीवन और विवेक-बुद्धियुत

    सृजनात्मक क्षमता वहाँ कहीं?

    उत्तम काव्य, कलाएँ और—

    वेद-शास्त्रों का सृजन होगा—

    पापी है जिसको रक्षाहित

    तेरी कृपा कभी मिली नहीं॥3॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : राष्ट्रीय कविताएँ एवं पांचाली शपथम् (पृष्ठ 71)
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक एन. सुंदरम् और विश्वनाथ सिंह 'विश्वासी'
    • प्रकाशन : ग्रंथ सदन प्रकाशन
    • संस्करण : 2007

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