यह दिन का समय था
बहुत सारे लोग आए हमारे पास एक साथ
लेते आए किन्हीं अपरिचित लोगों को।
आरंभ में कुछ भी न पूछ सका उनके विषय में
वे ऐसी भाषाओं में बातें कर रहे थे
जिन्हें मैं समझ नहीं पा रहा था
मैं बस मुस्कराता रहा
उनकी अपरिचित वाणी सुनते हुए।
कुछ की आवाज़ें
पहाड़ी बाज़ों की चीख़ों जैसी थीं
कुछ की साँपों की सरसराहट-सी,
कभी-कभी मुझे उनमें भेड़ियों की गुर्राहट भी सुनाई दी
उनकी वाणी में चमक थी धातुओं की,
भयावह लग रहे थे उनके शब्द।
भीतर ही भीतर गिर रहे थे उनके शब्द।
भीतर ही भीतर टकरा रही थीं पहाड़ी चट्टानें,
भीतर ही भीतर गिर रहे थे ओले,
गूँज रहे थे भीतर के जल-प्रपात।
पर मैं बस मुस्कराता रहा
कैसे समझ पाता उनके अर्थ!
पर क्या यह नहीं हो सकता
कि वे अपनी भाषा में
दुहरा रहे थे हमारा वह प्रिय शब्द—
प्रेम?
- पुस्तक : निकोलाई रेरिख की कविताएँ (पृष्ठ 39)
- रचनाकार : निकोलाई रेरिख
- प्रकाशन : रेरिख अध्ययन परिषद, नई दिल्ली
- संस्करण : 1995
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