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लिफ़्ट में फँसने के समय में

lift mein phansne ke samay mein

मिथिलेश श्रीवास्तव

मिथिलेश श्रीवास्तव

लिफ़्ट में फँसने के समय में

मिथिलेश श्रीवास्तव

और अधिकमिथिलेश श्रीवास्तव

    लिफ़्ट एक आख़िरी सहारा है गगनचुंबी मंज़िलों के घरों में पहुँचने की ख़ातिर

    मैं लिफ़्ट के भीतर हूँ और सोच रहा हूँ कि अचानक बिजली गुल हो जाए

    और लिफ़्ट दीवारों के बीच रुक जाए तो मैं क्या करूँगा

    लंबी गहरी साँसें लेने लगेंगे और बिजली के आने का इंतज़ार करेंगे

    इतंज़ार की एक हद होती है और साँसें इस हद तक चलती रहें

    उसके बाद क्या होगा

    एक जीवन मिला कि लिफ़्ट ऊपर चढ़ रही है

    लेकिन लिफ़्ट रुक जाए तो किसी तकनीकी ख़राबी से

    और तकनीशियन छुट्टी पर हो

    बाहर कोई हो मोबाइल का सिग्नल हो लिफ़्ट में इंटरकॉम हो

    मैंने महसूस किया लिफ़्ट रुक गई है दीवारों थोड़ा ऊपर

    छोटे से शीशे से बाहर की दुनिया दिख रही है

    मैंने शीशे को मुक्कों से तोड़ दिया

    मेरे हाथ ज़ख़्मी हो गए

    ज़ोर से चीख़ा मेरी चीख़ गई बाहर

    लोग आने लगे, एक ने कहा :

    हम गए हैं डरो मत

    गहरी साँसे लेते रहो

    राम-राम जपो

    किसी ने कहा आपके घर सूचना दे दी गई है

    कि आप फँस चुके हो

    किसी ने कहा ज़ोर-ज़ोर से राम राम बोलो

    किसी ने कहा हनुमान-चालीसा पढ़ो

    मैंने कहा मुझे याद नहीं है

    चूतिये हमने कितनी बार कहा याद कर लो

    किसी भले आदमी ने कहा गेट पर बोल दिया है केयरटेकर रहा है

    मैं कैसे कहूँ लिफ़्ट से बाहर आने के लिए मैं कितना छटपटाया हूँ

    यह दुनिया एक लिफ़्ट में तब्दील हो जाए

    तो उसके दरवाज़े को कौन खोलेगा

    मैं सोलहवीं मंज़िल पर पहुँच चुका था दरवाज़ा खुला

    और मैं बाहर भागा।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मिथिलेश श्रीवास्तव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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