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श्राप

shraap

श्रुति कुशवाहा

और अधिकश्रुति कुशवाहा

    किसी-किसी पर अपनी ही आग में जलने का श्राप होता है

    ये बारिश में जलते हैं

    भीषण जाड़े में

    नौतपे की आग से लोहा लेती है इनकी आग

    ये जलना यूँ जलना नहीं कि मुक्त हों

    बस सुलगते रहना है निरंतर

    इनकी ही आँच में सिंकता रहता है इनका मन

    मुक्तिबोध कहते हैं

    “कभी कभी ऐसा भी होता है,

    मन अपने को भूनकर खाता है”

    ये नरीमन पॉइंट पर समंदर किनारे पीठकर बैठने वाले लोग हैं

    इन्हें डर है इनकी आग से जल जाए समंदर

    इनकी आग के लिए कोई कारण नहीं

    इनकी आग के लिए सब कारण है

    कभी थोड़ा-सा प्रेम मिल जाए तो दहक उठते हैं

    विछोह में धुँधुआते रहते हैं सिगड़ी की तरह

    ये फूल से चोट लगने

    पानी से प्यासे रहने

    और आग में पनाह पाने वाले लोग हैं

    सुख सबसे बड़ा ईंधन है

    ये क्षण भर में जला डालते हैं सुख को

    इनकी आग इन्हें रौशन करती है

    कभी कभी कर देती है घुप अँधेरा

    और जो मद्धम हो जाए तो ये ख़ुद

    अपनी आग को हवा दे देते हैं

    आग से दोस्ती ख़तरनाक होती है

    इनकी उँगलियों पर अक्सर मिलेंगे छाले

    इन्हें पता है आग की जलन क्या होती है

    ये अपने घर आने वाले को सबसे पहले देते हैं पानी

    कुछ लोगों पर श्राप होता है कि वो जीवनभर

    एक ऐसी आग में जलते रहें

    जिसे कभी नींद नहीं आती

    जिसपर कभी छींटे नहीं पड़ते

    जो होती है पर दिखती नहीं

    ये आग में जलने वाले लोग

    पानी में गलने वाले लोग हैं

    इनका ख़ुद से बैर है आग-पानी की तरह

    स्रोत :
    • रचनाकार : श्रुति कुशवाहा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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