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रावणों का बाज़ार

ravnon ka bazar

संजीव कौशल

संजीव कौशल

रावणों का बाज़ार

संजीव कौशल

और अधिकसंजीव कौशल

    रावणों का बाज़ार लगता है 

    सुभाष नगर की पटरियों पे

    सड़कों के दोनों तरफ़ 

    रावण ही रावण 

    एक-से-एक मज़बूत 

    और टिकाऊ रावण 

    सजे-धजे हँसते-खिलखिलाते अट्टहास करते रावण

    कुंभकरणों और मेघनादों से घिरे विशालकाय रावण

    महीनों सजते हैं 

    तब पाते हैं अपने इस रूप में ये 

    कि इनके रंगीन और नए शरीर 

    सहज ही खींच लेते हैं हमें 

    कि हर आता-जाता निहारता जाता है इन्हें 

    जैसे दोस्त हों ये 

    बिछुड़े ज़माने के

    दूर-दूर तक जाते हैं ये 

    दिल्ली की मंडियों से 

    कि इनकी बढ़ती डिमाँड को देखते हुए 

    कई और लगाई गई हैं फैक्ट्ररियाँ यहाँ 

    ताकि कमी रहे रावणों की पूरे देश में कहीं

    और सभी को मिल जाए 

    अपने हिस्से का रावण 

    आसानी से

    फिर भी जाने क्यों 

    सड़कों से गुज़रते 

    सैलाब के बीच ठहरे 

    ये रावण

    घबराए से देखते हैं सारा दिन 

    कि जाने कौन-सी जगह है ये 

    कि लोग डरते ही नहीं

    कुछ समझते ही नहीं 

    उल्टा हँस-हँसकर चिढ़ाते हैं इन्हें

    अब कौन समझाए इन्हें 

    कि यह दिल्ली है मेरी जान 

    तुम क्या!

    राम भी घबराते हैं यहाँ घुसने से 

    इसलिए चूँ-चपड़ करो 

    बस खड़े रहो

    तैयार जलने को 

    जैसे आए हो जलते 

    सदियों से हमारे लिए।

    स्रोत :
    • रचनाकार : संजीव कौशल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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