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प्रेमिकाएँ

premikayen

श्रुति कुशवाहा

श्रुति कुशवाहा

प्रेमिकाएँ

श्रुति कुशवाहा

और अधिकश्रुति कुशवाहा

    प्रेमिकाओं का कोई नाम नहीं होता

    उनका कोई चेहरा भी नहीं होता

    प्रेमिकाओं का नाम ज़ोर से नहीं पुकारा जाता

    सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें अनदेखा किया जाता है

    प्रेमिकाएँ एकाँत की साथी होती हैं

    जहाँ फुसफुसाया जाता है उनका नाम

    चेहरे को कहा जाता है चाँद

    माँ की मृत्यु से टूटा

    बहन की रुखाई से परेशान

    पत्नी से ऊबा हुआ पुरुष

    प्रेमिका की बाँहों में पनाह पाता है

    दुखों का अस्थि कलश

    प्रेम की गंगा में बहा आने को आतुर

    प्रेमी एकाएक शिशु बन जाता है

    प्रेमिका इस शिशु को मन में धारण करती है

    छिपा लेती है अपने आँचल में

    प्रेम का ये सबसे पवित्र क्षण होता है

    लेकिन ये पवित्र क्षण केवल एकांत में संभव है

    मौज़ में प्रेमी

    प्रेमिका को फूल और ख़ुशबू पुकारता है

    कहता है तुम तो चालीस में भी उनतीस की लगती हो

    उनतीस में मिलती तो हम साथ फ़िल्म देखने चलते

    अब तो कोई कोई टकरा जाएगा थिएटर में

    यूँ सबके सामने तमाशा बनाना ठीक नहीं

    प्रेमिका अनसुना करती है

    प्रेम को तमाशा पुकारना

    पूछती है—चाय तो पियोगे

    ख़ूब अदरक डालकर बनाती है चाय

    देर तक खौलाती है

    चाय नहीं मन

    फिर कसैलापन दूर करने

    एक चम्मच चीनी ज़्यादा डाल देती है

    प्रेमी को उसके हाथ की बनी चाय ख़ूब पसंद है

    प्रेमिका सुख की सबसे आख़िरी हिस्सेदार होती है

    दुख की पहली

    प्रमोशन मिलने पर पुरुष

    सबसे पहले पत्नी को फोन करता है

    चैक बाउंस हो जाने पर प्रेमिका को

    प्रेमिका पूछती है

    कितने पैसों की ज़रुरत है

    कहो तो कुछ इंतज़ाम करूँ

    प्रेमी दिल बड़ा कर इनकार करता

    नहीं, मैं तो बस बता रहा

    तुमसे पैसे कैसे ले सकता हूँ

    प्रेमिका को जाने क्यूँ ख़्याल आता

    पैसे प्रेम से अधिक क़ीमती हैं

    वो कहना चाहती है

    सुनो, प्रेम दे दिया फिर पैसे क्या चीज़ हैं

    लेकिन कहते-कहते रुक जाती

    ये फ़िल्मी डायलॉग-सा सुनाई देता

    इस उम्र में ये चोंचलेबाज़ी अच्छी नहीं लगती

    कभी अचानक मॉल में प्रेमी के टकरा जाने पर

    वो देखती है उसकी अनदेखा करने की कोशिश

    लेकिन पहचान लेती है प्रेमी की पत्नी

    वो जानती है उसे सहकर्मी या पुरानी दोस्त के रूप में

    पूछती है—कितने दिन बाद मिलीं आप

    कैसी हैं, क्या कर रही हैं आजकल

    प्रेमिका बिल्कुल नज़रअंदाज़ करती है प्रेमी को

    उसकी पत्नी का हाथ पकड़ करती है कुछ बातें

    फिर जल्दी का बहाना बना निकल जाती बाहर

    अगले दिन प्रेमी बताता है

    पत्नी कह रही थी

    ‘आजकल उसके रंग-ढंग बड़े बदले से हैं’

    छेड़ में कहता है

    मेरे प्रेम ने तुम्हें रंगीन बना दिया

    प्रेमिका नहीं बताती

    कल लौटते में उसने फिर रुलाई पर काबू किया

    बस निकाल लाती है

    प्रेमी के फेवरेट कलर की टीशर्ट

    जो कल ख़रीदी थी मॉल से

    निकलते-निकलते प्रेमी कहता है

    सुनो घर जा रहा हूँ

    अब मैसेज मत करना

    फोन बच्चों के हाथ में होता है अक्सर

    जाते हुए प्रेमी का माथा चूमने को उद्दत प्रेमिका

    पीछे खींच लेती है क़दम

    कार में बैठते ही प्रेमी भेजता है एक कोमल संदेश

    फिर कोई जवाब पाकर सोचता है

    अजीब होती हैं ये प्रेमिकाएँ भी

    सच...कितनी अजीब होती हैं प्रेमिकाएँ

    स्रोत :
    • रचनाकार : श्रुति कुशवाहा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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