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ख़तरे उठाकर

khatre uthakar

प्रफुल्ल शिलेदार

प्रफुल्ल शिलेदार

ख़तरे उठाकर

प्रफुल्ल शिलेदार

और अधिकप्रफुल्ल शिलेदार

    कविता लिखते वक्त

    एक चींटी टेबल के कोने से

    दुबकती झिझकती रेंगती हुई आई

    टेबल पर रखी किताबों की काग़ज़ की फेरी लगाकर

    दूसरे कोने पर रखी पुरानी डिक्शनरी की ओर बढ़ी

    उसके दीमक होने की शंका मन में आई

    लिखते लिखते रुक गया

    पल भर भी सोचे बिना

    हाथ का पेन उलट कर

    उसे जहाँ थी वहीं सीधे रगड़ दिया

    किसे पता वह कौन है

    पर शंका रहनी चाहिए

    शंका का कारण बचा रहना चाहिए

    चींटी की कोई आवाज़ नहीं होती

    उत्पादमूल्य नहीं होता

    उनकी जघन्य हत्या को लेकर

    चींटियों का झुँड टूट नहीं पड़ता

    इस तरीक़े से उसकी हत्या होने पर

    किसी भी तबके की जाति की धर्म की

    अवमानना नहीं होती

    मृत चींटी के बीवी-बच्चे सड़क पर जाएँगे

    उसके दोस्त दुखी होंगे

    इन बातों पर सिर खपाना भी बेवकूफ़ी होगी

    इकट्ठे होना प्रतिरोध करना

    बदला लेना टक्कर देना

    लड़ते रहना

    ये सारी बातें

    चींटियों के औक़ात के बाहर की है

    कविता से उसे बहुत उम्मीद होती है

    कविता में जगह पाने के लिए ही वह

    लेखक के टेबल पर चली आती है

    लेकिन उस वक्त भी उसके इर्द-गिर्द

    दहशत और धुंध की परछाइयाँ

    मंडराती रहती है

    वह पुरानी डिक्शनरी से बिसरे हुए शब्द

    कविता में इस्तेमाल करने के लिए

    शक्कर के दाने जैसा

    उठाकर ला नहीं सकती मेरे लिए

    वह कोरे काग़ज़ पर

    अपने पाँवों से निकाल नहीं सकती

    अपने सुख-दुख की चित्रलिपि

    कवि से वह बहुत उम्मीद रखती है

    इसलिए अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाकर

    वह कविता में प्रवेश पाने के लिये

    चली आती है

    लेकिन कविता में आने से पहले ही

    वह मसल दी जाती है

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रफुल्ल शिलेदार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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