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कपाल-क्रिया

kapal kriya

मोना गुलाटी

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मोना गुलाटी

कपाल-क्रिया

मोना गुलाटी

और अधिकमोना गुलाटी

    तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व और चेतना का प्यार पाने के लिए मैंने स्वयं को

    निर्वसन कर दिया

    जन्मते शिशु-सा

    अबोध और निश्चिंत!

    मैंने अपनी हथेली में भर दी

    दूध की निश्छल गंध! मैंने

    विश्वस्त होकर छुए तुम्हारे होंठ और

    तुम्हारा कपाल। अब

    क्या मैं दब्बू प्यार के लिए आत्महत्या कर लूँ? या

    माँग लूँ तुम्हारे होंठ प्रतिदान में? लेकिन तुम

    वॉन गॉग नहीं हो और ही मैं तुम्हारी

    प्रेयसी या पत्नी! मैंने

    हवा से मात्र अपने ही अस्तित्व कण चुने

    थे; मात्र अपना ही

    संलाप!

    ग़लत लोगों के बीच और ग़लत स्थानों पर सुरक्षित लोगों के लिए

    कभी कोई कुछ नहीं कर सका। मेरे भीतर पल रहा है

    विस्फोट, पसलियों के नीचे हो रहा है

    घमासान युद्ध! तुम्हें कोई भी अवकाश देने से पूर्व,

    किसी भी मुक्ति संज्ञा में आवेष्टित कर फेंक देने से पहले

    मुझे लेना होगा पक्ष, करना होगा चुनाव,

    क्या मैं तुम्हारी अंधी और निस्तेज आँखों में भरे भय को चुन लूँ

    क्या मैं तुम्हारी सामंती नियति को दंश दूँ या

    थूक दूँ तुम्हारे सामाजिक कवच पर

    मुझे क्या करना था निरर्थक होने पर,

    ज्ञात था;

    एक सार्थक विश्वास से भ्रमित होने पर मुझे कोई

    प्रायश्चित नहीं है तुम्हारी भाँति।

    मैं नहीं लौटूँगी किसी खोह के अँधेरे में। मेरी

    हथेलियों की धूप में गर्मी है, मेरे बदन में

    ऐंठी हुई तपिश : पर मुझे नहीं रहा मोह

    कुलबुलाते नर-मादा कीटों का। मेरे अंतर में हमेशा

    लपट-सी उठने वाली विवित्सा किन्हीं अनाम आत्माओं के साथ

    तैर गई है अंतरिक्ष के पार! मेरे कंधों पर झुकी

    आहत लड़की

    अभी भी करती है स्निग्ध विश्वास और कापालिक प्यार

    और यात्राओं में भटकता उदास चेहरा देखकर होती है

    संतप्त और जड़!

    भीतर ही भीतर उभरते युद्ध से होती है अपरिमेय घृणा

    मूर्ख और भद्दे और अनाम लोगों से असहाय घृणा कर

    मैं नहीं होना चाहती

    बोर या व्यर्थ! मैंने

    निश्चय किया है, तुम्हें

    तुम्हारे युग को

    तुम्हारी जाति को

    तुम्हारे वर्ग को

    तुम्हारे समाज को

    तुम्हारे लिंग को

    तुमको

    लौटा देने का!

    स्रोत :
    • पुस्तक : महाभिनिष्क्रमण (पृष्ठ 68)
    • रचनाकार : मोना गुलाटी

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