13 जनवरी 78

मोना गुलाटी

13 जनवरी 78

मोना गुलाटी

और अधिकमोना गुलाटी

    19 जनवरी 78 मेरी मौत का दिन है : और इतनी

    शताब्दियों के पश्चात्

    कोई मुझसे कहे कि तुम

    फिर से जीना शुरू कर दो और

    हाड़-मांस का सितार

    लेकर संगीत बन जाओ : ...तब

    मुझे क्या करना होगा, अंधे और बेतरतीब ढंग से

    टँगे हुए ज्योति-हीन सूरज को लेकर!

    19 जनवरी 1878 मेरा अंधापन लेकर ऊँघने के

    लिए आकाश और समय में

    लटक गया है त्रिशंकु की

    तरह और तुम मेरे बौनेपन को

    बार-बार घुटनों से रिसते हुए घाव की तरह

    क्यों पटक देना चाहते हो मेरे

    सामने!

    यह सच है मैंने सोचा था

    कि आकाश में चमकते

    नक्षत्रों की भाँति मेरी मुट्ठी में भी

    आग होगी

    और तुम्हारे रक्त की गर्मी में मेरी

    गंध आवाज़ होगी :

    यह भी सच है कि इस

    सबको मैंने भीगी हुई लकड़ी या रूमानी

    संभावना की तरह नहीं छोड़ दिया है

    और ही आकाश की

    तरफ़ हाथ उठाकर इसे बना

    दिया है

    कोई मुद्रा जिसे

    समझने के लिए तुम्हें इतिहास का कोहरा उठाना पड़े

    और नदी के जल में भीतर

    तक झाँकना पड़े

    इतना झाँकना पड़े कि तुम्हारे

    रोम-रोम से बहाव टपकने लगे :

    आह!

    इस सोच में कोई भी चमत्कार नहीं था भाषा

    का या भावना का

    संवदेना का या आकाशतीत

    हो जाने का :

    मैंने मात्र इतना ही चाहा था कि मेरी मुट्ठी में भी

    एक आग हो

    चमकते नक्षत्र की भाँति जिसे

    देखकर मुझे अपने होने की सांत्वना रहे और

    तुम्हें खिलखिलाने का मौक़ा मिलता रहे

    कि आस-पास है

    कुछ चमकदार!

    यह तब तक सच था

    जब तक मैंने

    बातें की थीं कि मेरी

    इच्छा तुम्हें चमत्कृत करने

    या बेवक़ूफ़ बनाने की थी :

    पर अब

    मुझे ज्ञात हो गया है कि मेरी आकांक्षा

    केवल अपने

    जूते में गड़ी कील निकालने तक ही सीमित थी

    और वह जूते की कील ही

    मेरी मुट्ठी की आग थी :

    13 जनवरी 1978 मेरी

    बदहवासी दूर करने

    की सौग़ात है : तुम इसे

    कुछ मत समझो

    यह समय और आकाश में लटका हुआ पिंड है

    तुम इसे देखो और मुझे

    दुआएँ दो कि

    मैंने अपने कंधों पर रखी बंदूक़ को उतार कर ज़मीन पर

    रख दिया है और बंदूक़ और मिट्टी और ज़मीन और आग

    अब मेरे कपड़े नहीं उतारते और मेरे जिस्म में

    हवा नहीं भरते :

    मेरी हथेलियों का पसीना

    तुम्हारी हथेलियों को भिगोएगा नहीं :

    अब तुम

    बिना संतप्त चेहरा लिए देखना

    और देखना :

    13 जनवरी 1978 मेरे

    फैल जाने का दिन है :

    विस्तार के उन्माद में!

    तुम

    मेरे साथ उठो

    और सुनो

    पहाड़ों के पीछे डूबे

    नक्षत्रों से उभरता

    बिना सुरताल मिलाए

    उमगता

    निःस्तब्ध संगीत

    तुम

    सुनो और सुनो

    सुनो!

    स्रोत :
    • पुस्तक : सोच को दृष्टि दो (पृष्ठ 94)
    • रचनाकार : मोना गुलाटी

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