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निश्चय

nishchay

अनुवाद : डॉ. ब्रज मोहन गुप्त

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    ये सागर के हैं आवाहन

    मुझे उस पार जाना है,

    ये लहरें क्या, किनारे क्या

    मेरे जन्मों के साथी हैं

    मेरे जीवन के हैं महरम

    इन लहरों से भिड़ते ही

    मेरी नैया, मेरा पतवार

    मेरा कोई हौसला बनकर

    क़दम कुछ और चलने को

    मुझे मजबूर करता है

    पर!

    मुझे अक्सर है यह लगता

    बहुत हूँ दूर निकला

    मैं सदियों से चला हूँ पर

    सफ़र का अंत होगा।

    पर!

    अब आगे और चलने की

    क्यों ऐसी भी लाचारी है

    बहुत ही बह चुका पानी

    मेरे संग पहले से ही

    किसी समुद्र की जानिब।

    यह मेरा मोह हो कोई

    जो मुझे और चलने को

    सदा मजबूर करता है।

    यह कैसी कोई मजबूरी

    है पल-पल हौसला देती

    मुझे दिन-रात चलने का

    कभी सूरज की किरणों में

    कभी सागर की लहरों में

    पर

    कहाँ वह सकत अब बाक़ी

    कहाँ गर्मी वह साँसों में

    तनिक-सा और चलने की

    दृष्टि आँखों की अब तो

    हुई कमज़ोर काफ़ी

    चला जाऊँ क्यों उस ओर

    उन कच्चे घरों में फिर

    जहाँ कौआ मुंडेरों पर

    बैठा गीत गाता है

    निशि-दिन मेरे आने के,

    जहाँ पर साँझ ढलते ही

    सुहागन एक विरहन-सी

    गगन पर चाँद आते ही

    सुकोमल चाँदनी-जैसा

    सजाकर रूप अपना भी

    बिछाकर सेज फूलों की

    पसारे गोरी बाँहों को

    किसी की झूठी आशा में

    प्रतीक्षा कर रही होगी

    खोलकर पट किवाड़ों के

    वह पल-पल झाँकती होगी

    हवा का झोंका जब कोई

    उसे जो छेड़ता होगा

    तो गुमसुम पतले होंठों पर

    हँसी थिरकती होगी

    लहर सी मचलती होगी

    धवल कुहरे की चादर में

    है उसका तरसता यौवन

    कोई नभ की वह बदली-सी

    काले केश बिखराकर

    धधकते सीने से चिपकी

    हृदय के ताक के ऊपर

    मेरी कोई देख के तस्वीर

    मेरी यादों में गुम होकर

    मेरे आने की आशा में

    वह गुमसुम तड़पती होगी

    पल-पल सहकती होगी।

    समय की पालकी के संग

    वह वैरन भाख है गाए

    भरे यौवन की मस्ती में

    तपिश ढूँढ़े जवानी की

    उड़ान ऊँची कोई भरती

    मसोसती हृदय रह जाए

    छुपाकर वेदना सारी

    लखन की उर्मिला-जैसी।

    साँझ का सूर्य ढलते ही

    देखकर लौटते पंछी

    यह थोड़ा सिसकती होगी

    कुछ आँसू उसकी आँखों से

    टप टप टपकते होंगे

    मेरे आने की आशा में

    बँधी विश्वास में मेरे

    क्यों चुपचाप उड़ जाऊँ

    लौटते पक्षियों के संग

    सजाकर गीत अधरों पर

    मैं अपनी प्रेयसी की ओर।

    पर...

    ये सागर के हैं आवाहन

    मुझे उस पार जाना है

    ये लहरें क्या, किनारे क्या

    मेरे जन्मों के साथी हैं

    कभी सूरज की किरणों में

    कभी बादल की छाया में

    कभी लहरों के आंचल में

    मेरी प्रेयसी की यह मूरत

    करे अठखेलियाँ मुझसे।

    मेरे रास्ते को क्यों रोके?

    मेरे निश्चय को क्यों टोके?

    मेरे संग हौसला मेरा,

    मेरे संग हादसे मेरे,

    मुझे तो दूर जाना है,

    झमेलों और मेलों से।

    मेरे संग सोच मेरी है

    मेरे संग जोश मेरा है

    मेरी आदत ही चलना है

    भले ही दृष्टि अब मेरी

    हुई कमज़ोर है काफ़ी

    नहीं चलने की वह शक्ति

    लहू में अब यह गर्मी

    अब छूटा साथ अपनों का

    समय के क्रूर खंज़र ने

    मेरी देह आत्मा पर हैं

    अनेकों घाव दे डाले।

    पर

    मेरी आदत ही चलना है

    मेरे कुछ शौक़ हैं बाक़ी

    धड़कते मेरे सीने में

    मेरी तुम राह मत रोको,

    मेरे निश्चय को मत टोको।

    ये सागर के हैं आवाहन

    मुझे उस पार जाना है

    ये लहरें क्या किनारे क्या

    मेरे जन्मों के साथी हैं

    सजाकर रास्ता मेरा

    सुहाने पंछी कहते हैं।

    रुकना बीच राहों में

    तनिक आँखों के शीशे से

    हृदय में झाँककर देखो—

    तुम्हारे संग चलते हम

    कई सदियों से सहते हम

    सुहानी पीड़ मंजिल की

    कटे हैं पंख कितनी बार।

    फूँके नीड़ कितनी बार।

    करके ख़ुदकुशी कई बार

    अस्तित्व अपना बिखराया

    आशा फिर भी है बाक़ी

    इन पंखों से उड़ने की

    हमें सूरज को छूना है

    हमें भी पार जाना है

    थके अब तक नहीं हैं हम

    अभी तक गीत मुख़रित हैं

    धरा पर, नभ में, सागर में।

    तेरी छाती के ये सागर

    तुम्हारी रूह के आवाहन

    तुम्हारी देह की नैया

    तुम्हारी सोच के पतवार

    तेरा शृंगार करने को

    तुझे देते हैं आवाहन।

    तेरा निश्चय वे लहरें

    हवा जिनको उड़ा लेगी

    जहाँ चाहे भगा देगी

    समझकर गगन का बादल

    तू चलता चल तुझे चलना

    नई राहों की आहट से

    नई मंज़िल की चाहत में

    नई पीढ़ी की आँखों में

    झलकता गीत हर तेरा

    वह शायद जान जाए तेरे

    इन गीतों की सरगम को

    या उससे भी कहीं आगे

    नए अंकुर जब फूटेंगे

    तब उसने गीत ये गाने।

    तू अपना स्वयं रस्ता रोक

    सुहानी चाँदनी को देख

    रुक जाना राहों में।

    ये लहरें क्या किनारे क्या

    मेरे जन्मों के साथी हैं

    तेरे जीवन के हैं मरहम

    इन लहरों से भिड़ते ही

    तेरी नैया, तेरा पतवार

    तुम्हारा हौसला बनकर

    क़दम कुछ और चलने को

    तुझे मजबूर करता है

    ये सागर के हैं आवाहन

    तुझे उस पार जाना है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आधुनिक डोगरी कविता चयनिका (पृष्ठ 158)
    • संपादक : ओम गोस्वामी
    • रचनाकार : अभिशाप
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी
    • संस्करण : 2006

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