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नींद

neend

श्रुति कुशवाहा

और अधिकश्रुति कुशवाहा

    जीवन के आरंभ से शुरू हो जाता है मृत्यु का अभ्यास

    नींद से बड़ा नशा क्या होगा भला

    या इसे दवा भी कह सकते हैं

    हम ठीक से सो पाएँ बस इसीलिए ढल जाता है सूरज

    रात और नींद का अटूट नाता है

    दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे चलती हैं

    हालाँकि कई बार कुछ लोग इतना सोते हैं कि

    अंधेरा कुछ ज़्यादा ही गहरा जाता है

    लेकिन इस बात का नींद से कोई सीधा संबंध नहीं है

    नींद इतनी ज़रूरी है कि

    इसके लिए ईजाद हुई दवा

    ग्यारह दिन सोएँ तो हो सकती है मौत

    यहाँ आप ‘दिन’ को रात समझिएगा

    बिलकुल उसी तरह

    जैसे कई लोग सरकार को राष्ट्र समझते हैं

    हाँ तो मैं बता रही थी...नींद कितनी ज़रूरी है

    ठीक-ठीक जागने के लिए अच्छे से सोना ज़रूरी है

    लेकिन कई बार सोने के बाद फिर सोने का मन करता है

    ये उसी तरह का भटकाव है

    जैसे ये कविता भटक रही है

    नींद की बात करते अँधकार और सरकार तक जा पहुँची

    कि सरकार अब नींद को लेकर काफ़ी सजग है

    वो सुनिश्चित करती है कि सोई रहे जनता

    सोए हुए लोग ख़तरा नहीं होते

    इसीलिए जगह जगह खोल दिए हैं लोरी-सेंटर

    तो बात नींद की हो रही थी

    नींद जैसे एक जंगल है

    जहाँ हर रात लगता है फेरा

    या कोई धुन

    या जादू जो हर रात जागता है

    नींद जैसे कोई प्रियतमा

    जम्हाई नींद का प्रेम पत्र है

    स्रोत :
    • रचनाकार : श्रुति कुशवाहा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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