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मेरा सब कुछ अप्रिय है उनकी नज़र में

mera sab kuch apriy hai unki nazar mein

निर्मला पुतुल

निर्मला पुतुल

मेरा सब कुछ अप्रिय है उनकी नज़र में

निर्मला पुतुल

वे घृणा करते हैं हमसे

हमारे कालेपन से

हँसते हैं, व्यंग्य करते हैं हम पर

हमारे अनगढ़पन पर कसते हैं फब्तियाँ

मज़ाक़ उड़ाते हैं हमारी भाषा का

हमारे चाल-चलन रीति-रिवाज

कुछ पसंद नहीं उन्हें

पसंद नहीं है, हमारा पहनावा-ओढ़ावा

जंगली, असभ्य, पिछड़ा कह

हिक़ारत से देखते हैं हमें

और अपने को सभ्य श्रेष्ठ समझ

नकारते हैं हमारी चीज़ों को

वे नहीं चाहते

हमारे हाथों का छुआ पानी पीना

हमारे हाथों का बना भोजन

सहज ग्राह्य नहीं होता उन्हें

वर्जित है उनके घरों में हमारा प्रवेश

वे नहीं चाहते सीखना

हमारे बीच रहते, हमारी भाषा

चाहते हैं, उनकी भाषा सीखें हम

और उन्हीं की भाषा में बात करें उनसे

उनका तर्क है कि

सभ्य होने के लिए ज़रूरी है उनकी भाषा सीखना

उनकी तरह बोलना-बतियाना

उठना-बैठना

ज़रूरी है सभ्य होने के लिए उनकी तरह पहनना-ओढ़ना

मेरा सब कुछ अप्रिय है उनकी नज़र में

प्रिय है तो बस

मेरे पसीने से पुष्ट हुए अनाज के दाने

जंगल के फूल, फल, लकड़ियाँ

खेतों में उगी सब्ज़ियाँ

घर की मुर्ग़ियाँ

उन्हें प्रिय है

मेरी गदराई देह

मेरा मांस प्रिय है उन्हें!

स्रोत :
  • पुस्तक : नगाड़े की तरह बजते शब्द (पृष्ठ 72)
  • रचनाकार : निर्मला पुतुल
  • प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ
  • संस्करण : 2005

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