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चुटकुला

chutkula

श्रुति कुशवाहा

और अधिकश्रुति कुशवाहा

    औरतों का बोलना हमेशा से चुटकुला रहा है

    ‘दो औरतें ख़ामोश बैठी थीं’ इस पर ठठाकर हँस पड़ते हैं आदमी

    ये वही आदमी हैं जिनके घरों में औरतें चूँ तक नहीं करतीं

    वे इसे बड़े फ़ख़्र से बताते हैं

    बुख़ार-हरारत में औरत ने कभी नहीं कहा तबियत ख़राब है

    हाथ जल जाने पर भी उसने परोसीं गर्म रोटियाँ

    कटे-छिले हाथों से धोए घर-भर के कपड़े

    नींद उसने मरने तक मुल्तवी कर दी

    बचपन से ही मिली थी नसीहत

    लड़कियाँ चपर-चपर नहीं करती

    औरतों की ज़बान बोलने और स्वाद लेने के लिए नहीं होती

    और की ज़बान हामी भरने तक महदूद रही

    कभी जो उसने कोशिश की बोलने की

    तो ज़बान खींच लेने की धमकी मिली

    इस तरह औरतों ने सिल ली अपनी ज़बान

    औरतों को चुटकुलों में बेतरह बोलते-हँसते बताया गया

    वो करती रहीं ढेर शॉपिंग, उनकी आँखें नहीं नल थे

    वार्डरोब भरा होने पर भी उनके पास पहनने को कपड़े नहीं होते

    सारे पति अपने घर में भीगी बिल्ली बने रहते हैं

    खाने में क्या बनेगा, ये औरतों की वैश्विक समस्या है

    चुटकुलों में औरतें पतियों को बेलन दिखाती हैं

    चुटकुलों में आदमी चुपचाप खा लेता है टिंडे की सब्ज़ी

    आदमी के लिए औरतों की हँसी और आँसू सनातन चुटकुले हैं

    आदमी इन पर पेट पकड़ हँस रहा है

    औरतें रो रही हैं चुटकुलों पर...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : वनमाली कथा, वर्ष-1, अंक-12, जनवरी-2023 (पृष्ठ 67)
    • संपादक : कुणाल सिंह
    • रचनाकार : श्रुति कुशवाहा

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