मनबोध बाबू के नाम पत्र

निलय उपाध्याय

मनबोध बाबू के नाम पत्र

निलय उपाध्याय

और अधिकनिलय उपाध्याय

    मनबोध बाबू,

    तुम्हीं से मैंने जाना कि जीवन का कोई विकल्प नहीं होता।

    इस परती समय में कोई घड़ी सही वक़्त नहीं देती।

    तारीख़ नहीं देते

    कैलेंडर। कोई नायक, कोई मुद्दा, कोई मूल्य नहीं दिखाई देता।

    आसमान की राह गुज़रने वाली नदियों में कोई पाल दिखाई नहीं देती।

    एक तुम्हीं हो, जो नष्ट करने की इस क्रूरतम तकनीक को विकास

    नहीं मानते। इस विशाल ब्रह्मांड से निकलकर मेज़ की दराज़ में

    नहीं अँट पाते।

    सब्ज़ियों से अलग हो रहा है स्वाद। साँसों से हवा। सिर के

    ऊपर धड़ाधड़ गुज़र रहे हैं तेज़ाबी पहाड़। हम क्या करें...?

    कहाँ से ले आएँ उम्मीदें...? कहाँ से शुरू करें यक़ीन...?

    कैसी हो इस समय की कविताई? कैसी हो भाषा...?

    मनबोध बाबू! तुम मुझसे कहाे, मैं तुमसे कहूँगा। कहते-

    सुनते कम होते जाते हैं पृथ्वी के दुख। कठिन राह और कठिन

    रात ऐसे ही कहती है। ऐसे ही पकड़ में आता है सिरा और

    शुरू होता है जीवन...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कटौती (पृष्ठ 11)
    • रचनाकार : निलय उपाध्याय
    • प्रकाशन : राधाकृष्ण प्रकाशन
    • संस्करण : 2000

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