कूकर
kukar
कभी-कभी सोचता हूँ क्या हमेशा झीकूँगा लड़ पाऊँगा इस तरह
कब तक बना रहूँगा संभ्रांत नज़रों में एक अवांछित कमीना या ख़तरनाक
विदूषक
कब तक ड्राइंग रूमों में मेरे घुसने पर लोग होते रहेंगे चुप और व्यस्त
कब तक मेरी आवाज़ सुनकर टेलीफ़ोन रखे जाते रहेंगे
सूचियों में मेरे नाम के आगे ग़लत या प्रश्न का निशान लगाया जाता रहेगा
सोचता हूँ कि क्या मैंने ठेका ले रखा है अपने दंभ की आत्मकेंद्रीयता में
अपना जीवन सिर्फ़ अपनी शर्तों पर जीने का
जिसे मैं सही समझता हूँ मजमे में वही बात कह देने का
इस तरह से क्या बहुत बड़ा हासिल हो गया है मुझे अब तक
न पद न पैसा न यश न सुख
कुछ लोग यही पाने के लिए स्वाँग भरते हैं और आसानी से पा जाते हैं
यहाँ यह हाल है कि कोई शुभचिंतक मित्र भी पूरा अपना नहीं
मेरा ज़िक्र आने पर वे या तो चुप रहते हैं
या आधे दिल से विहँस कर पैरवी करते हैं या बात बदलने का यत्न
नहीं या आत्मदया नहीं है और न पछतावा है
उद्दंडता या बेवकूफ़ी या अहम्मन्यता इसे भले ही कह लिया जाए
मैं जैसा हूँ वैसा हूँ और वैसा ही पैदा हुआ होऊँगा
शरारत शुरू में ही कहीं हो चुकी थी मेरे साथ और अब लाचार हूँ
मैं जो कुछ करता रहा हूँ और करूँगा
उस पर सब कुछ सोचते हुए भी कोई वश मेरा नहीं है
जानते हुए कि अंत में यह सब अकारथ है और हास्यास्पद भी
मैं यह नहीं कहता कि मैं जैसा हूँ मुझे वैसा ही स्वीकार किया जाए
मैं सिर्फ़ आगाह कर देना चाहता हूँ कि मुझसे दूर रहा जाए
दरख़ास्त करता हूँ कि मुझे
बेवकूफ़ या किसी और के खेल मे शामिल होने वाला
कायर या शोहदा न समझा जाए
मैं अपने नियमों से अपना खेल अकेले ही खेल लूँगा
इस उम्मीद में कि दिमाग़ में जो एक कील-सी गड़ी हुई है
और दिल में जो कड़वाहट है वह वैसी-सी रहेगी अंत तक
कबीर निराला मुक्तिबोध के नाम का जाप आजकल शातिरों और जाहिलों में जारी है
उन पागल संतों के कहीं भी निकट न आता हुआ सिर्फ़ उनकी जूठन पर पला
छोटे मुँह इस बड़ी बात पर भी उनसे क्षमा माँगता हुआ
मैं हूँ उनके जूतों की निगरानी करने को अपने ख़ून में
अपना धर्म समझता हुआ भूँकता हुआ।
- पुस्तक : पिछला बाक़ी (पृष्ठ 82)
- रचनाकार : विष्णु खरे
- प्रकाशन : राधाकृष्ण प्रकाशन
- संस्करण : 1998
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