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जानना

janna

जानना बेहद ज़रूरी है ख़ुद को

यह जानते हुए कि

ख़ुद से बेहतर

कोई नहीं जान सकता

मुझे

जब जानना चाहा ख़ुद को

तो उतरने लगा

तालाब की तलहटी तक

झूमने लगा फ़सलों के साथ

रिसने लगा चट्टानों के बीच

लगा कि अब पसर रहा हैं रिश्तों के भीतर

चमक उठा हूँ असंख्य पुतलियों में

गा रहा हूँ अनंत राग

तब जाना कि ख़ुद को जानने का

इससे बेहतर कोई और रास्ता नहीं हो सकता।

स्रोत :
  • पुस्तक : उम्मीद अब भी बाक़ी है (पृष्ठ 66)
  • रचनाकार : रविशंकर उपाध्याय
  • प्रकाशन : राधाकृष्ण प्रकाशन
  • संस्करण : 2015

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