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किसान आंदोलन में जलेबियाँ

kisan andolan mein jalebiyan

कपिल भारद्वाज

कपिल भारद्वाज

किसान आंदोलन में जलेबियाँ

कपिल भारद्वाज

और अधिककपिल भारद्वाज

    सहस्त्रों वर्षों से जानता है किसान

    बीज से पौधा बनाना, पौधे की रक्षा करना

    पौधे से फल प्राप्त करना।

    वह जानता है कि कौनसी मिट्टी में क्या बोया जाए

    तो बेहतर रहे।

    कपास का फूल कितने दिनों बाद

    रुई बनकर महकेगा, वह जानता है।

    गेहूँ की कच्ची बालियों का दूध

    कब ठोस बनकर, मिटा सकता है हज़ारों-लाख़ों पेटों की भूख

    वह जानता है।

    वह जानता है कि बाजरे की सिर्टी के दाने

    कितना पानी माँगते हैं पकने के लिए।

    वह यह भी जानता है कि गन्ने से गुड़ बनाने के लिए

    कितनी आग की होती है ज़रूरत।

    वह जानता है मिट्टी और पानी का रिश्ता

    वह जानता है भूखे पेटों में लगने वाली आग की भयावहता

    वह जानता है बैलों की आँखों का दर्द

    वह जानता है रंग बिरंगी दुनिया के मेले ठेले

    वह जानता है ग़रीब होने के अभिशाप को

    वह जानता है क़र्जे़ में पिस रहे आदमी की मजबूरी

    वह जानता है हारी-बीमारी में पड़ी अपनी लुगाई का दुख

    वह जानता है अपने बच्चों की फ़ीस ना चुकाने पर आए रिजल्ट को।

    वह बहुत कुछ जानता है

    धरती के गर्भ में पल रहे बीज से लेकर

    मौसमों के गिरते पड़ते स्वास्थ्य से लेकर

    आँधियों-बिजलियों, तूफ़ानों के स्वभाव को।

    वह जानता है रोटी बनाना, पकवान बनाना

    हलुवा-पूरी, समोसे, मालपूड़े बनाना

    मिठाई बनाना, खुरमे बनाना

    रसगुल्ले, बालूसयाही, जलेबी बनाना

    कढ़ी बनाना, दाल चूरमा, चटनी बनाना

    पिज़्जे-बर्गर बनाना, गोलगप्पे बनाना, चाउमीन बनाना।

    उसके सिर पर होता है

    सैंकड़ों वर्षों के इतिहास का बोझ

    उसके सपनों में आते हैं करोड़ों फैले हुए हाथ

    जो उससे माँगते हैं पेट भराई अन्न।

    वह करता है विद्रोह ज़मीदारों के ख़िलाफ़

    जिनके अबोध बच्चे भी किसानों की पीठ पर बरसाते हैं कोड़े।

    वह करता है विद्रोह उन मोटे पेट वाले सेठों के ख़िलाफ़

    जो बैठे बैठे पादते रहते हैं नरम गद्दी पर और

    जो भर लेते हैं अपने गोदामों को

    उन्हीं के उगाए गए अन्न से।

    वह करता है विद्रोह उस तानाशाह से

    जो बिगड़ैल साँड की तरह

    नेस्तनाबूद करने की कोशिश करता है देश को

    रौंदने से रोकता है किसान अपनी फसल को

    वैसे ही रोकता है तानाशाह को, नकेल कसकर।

    वह करता है विद्रोह और मरता-खपता रहता है

    मरकर जिंदा होता रहता है हमेशा

    और ज़िंदा रखता है संसार को।

    जब इतना कुछ जानता है किसान

    तो क्या वो जलेबियाँ भी ना खाए-खिलाए!

    स्रोत :
    • रचनाकार : कपिल भारद्वाज
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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