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खिलते हैं फूल कितने

khilte hain phool kitne

अनुवाद : राजेंद्र प्रसाद मिश्र

जानकी बल्लभ पटनायक

जानकी बल्लभ पटनायक

खिलते हैं फूल कितने

जानकी बल्लभ पटनायक

और अधिकजानकी बल्लभ पटनायक

    खिलते हैं फूल कितने

    फिर लोटते हैं भू-पर

    जीतते हैं जन-मन

    शोभा सुगंध बुनकर।

    शोभा होती है किसमें

    नहीं होता है सौरभ

    श्रीहीन होकर कौन

    पाता नहीं है गौरव।

    अनादर से भय

    और आदर से प्रीति,

    करते खिलते हैं फूल

    यही है चिरंतन रीति।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सिंधु उपत्यका (पृष्ठ 64)
    • रचनाकार : जानकी बल्लभ पटनायक
    • प्रकाशन : नेशनल पब्लिशिंग हाउस

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