कविता के अनुवाद के बारे में
kavita ke anuvad ke bare mein
एक अनाड़ी भौरे की तरह
वह जाकर बैठ जाता है फूल पर
कोमल डंठल झुक जाता है
पंखड़ियों के बीच जो कि होती हैं
शब्दकोश के पत्रों की तरह
वह बना लेता है अपना रास्ता
और पहुँचने की कोशिश करता है वहाँ
जहाँ छिपी रहती है गंध और मिठास
और हालाँकि वह खा गया है ठंड
और उसने खो दी है अपनी स्वाद की चेतना
लेकिन फिर भी वह उस दुराचार से
तब तक बाज़ नहीं आता
जब तक उसका सिर
पीले पुष्परज से टकरा नहीं जाता
और यहाँ ख़त्म होता है सारा खेल
क्योंकि असल में कोई पहुँच ही नहीं सकता
एक फूल की पंखड़ियों से
उसकी जड़ों के पास तक
इसलिए भौंरा निकल आता है बाहर
दर्प के साथ गुंजार करता हुआ
कि वह फूल के अंदर से आ रहा है
और वे जो उस पर विश्वास नहीं करते
वह उन्हें दिखाता है अपनी नाक
जिस पर लगा होता है
पराग का पीला धब्बा।
- पुस्तक : अन्तःकरण का आयतन (पृष्ठ 53)
- संपादक : रेनाता चेकाल्स्का और अशोक वाजपेयी
- रचनाकार : ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त
- प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
- संस्करण : 2003
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.