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खोई हुई चीज़

khoi hui cheez

प्रफुल्ल शिलेदार

प्रफुल्ल शिलेदार

खोई हुई चीज़

प्रफुल्ल शिलेदार

और अधिकप्रफुल्ल शिलेदार

    खोई हुई चीज़

    जहाँ खो जाती है

    वहीँ सुकून से पड़ी रहती है

    मासूमियत में

    भीतर ही भीतर मुस्काती

    आख़िर छूट गई उसकी ऊँगली

    मिल गई मुक्ति

    उसके लिहाज़ से तो गुम हो गए हैं

    असल में तो

    हुए हैं आज़ाद

    कितनी सुखद होती है

    आज़ादी

    सभी बंधनों से मुक्त

    अपने गुरुत्वाकर्षण में

    खुले आकाश में विहरना

    इतने दिनों तक अपनी कोई

    अलग पहचान ही नहीं थी

    जो थी उसी की वजह से थी

    उसकी कोई चीज़ हो

    यही थी अपनी पहचान

    अब वैसा नहीं रहा

    भले रास्ते के बीचों-बीच पड़ी या

    हरी दूब पर लेटी हुई

    या पाँवोतले कुचली जाती हुई

    लेकिन आज़ाद

    अब...दुनियादारी है

    किसी की तो नज़र पड़ेगी

    दूरसे भांप लेगा

    पसंद गई तो झट से उठाकर

    इधर-उधर देखकर डाल देगा जेब में

    फिर डाँट-डपट कर बोलेगा

    बस कर तेरी आज़ादी

    अब हो तुम मेरी जेब में

    इसके आगे ख़ूब इतराना

    यही जताकर कि तुम

    अब मेरी चीज़ हो

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रफुल्ल शिलेदार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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