ज्वर था या संताप, मुझे नहीं पता
बदन की एक-एक नस दुखती थी
हाथ-पाँव काँपते थे, जाने किस डर से
तुम पहले आदमी तो नहीं थे मुझे छोड़ के जाने वाले
आख़िरी भी नहीं होगे, निश्चित है
सुबह सब पूछते रहे कि आवाज़ को क्या हुआ
कैसे बताऊँ कि पराए आदमी के छूटने का ग़म मना रही
ग़म भी इतना कि आधी रात तक छत के कोने ने मेरे आँसुओं का स्वाद चखा
सिगरेट रात से सुबह तक पचास से ऊपर हो चुकी थी
तुम्हारे हाल पूछने पर दो और सुलगा लीं—ठीक तो हूँ मैं
ठीक नहीं क्या?
तुम्हारे सामने आते ही मुश्किल से इकट्ठा किया हुआ बदन
अलग टुकड़ों में फिसलकर काँपने लगा
काश ये मेरा स्वांग होता! अपनी अदाकारी पर पीठ थपथपाती
मैं
अभी मुस्कुराने का असफ़ल प्रयास कर रही हूँ
तुम मेरी कलाई नहीं थामते तो बेहोश होकर गिर जाती
और मेरा बदन काँपता ही रहता
तुम्हारे छूते ही इतनी सहजता कैसे आई?
क्या सचमुच सुधा का इलाज चंदर ही जानता था? हीर का इलाज जॉर्डन?
अब मुझे नींद आ रही है, अब मुझे सुला दो
अब मेरी आँखें तुम्हारी हथेली का स्पर्श पहचानती हैं
तुम हाथ रख दोगे तो बेचैनी में भी सो जाएँगी
मैं बीमार कब हो गई, तुम मेरा इलाज कैसे जान गए?
- रचनाकार : शिवांगी गोयल
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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