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भूख

bhookh

अनुवाद : शिवम तोमर

विश्वास नहीं हो रहा कि

कामोत्तेजना मेरी पीठ पर इस तरह लद जाएगी

अपनी व्यग्रता से पार पाकर मछुआरे ने जाल बिछाया

और एक लापरवाह लहजे में मुझसे पूछा :

‘‘क्या तुम्हें वह चाहिए?’’

इन शब्दों ने मानो

उसके एक उद्देश्य को दोषमुक्त कर दिया हो

फीकी-सी मुस्कुराहट में से झाँकते उसके दाँत

उसकी आँखों में निहित बेचैनी के साथ द्वंद्व में थे

रेत के विस्तार में चलकर मैं उसके पीछे-पीछे गया

मेरा मन गोफन-सी इस देह में धड़क रहा था

इस पाप से मुक्त होने में

शायद मुझे अपना घर जलाना पड़ जाए

एक चुप ने मेरी आस्तीन पकड़ ली

मछुआरे की देह उस जाल को खींचते दुहरी हो गई है

जो सिवाय झाग के कुछ और बाहर ला सका

टिमटिमाते अँधेरे में

मछुआरे की कुटिया एक घाव की तरह खुली

जिसके भीतर मैं ही हवा था

और मैं ही दिन और रात

कुटिया में खुरसे ताड़ के पत्तों ने मेरी त्वचा खरोंच दी

तेल के दिए से निकलकर समय

कुटिया की दीवारों पर छाया हुआ था

रह-रहकर वही चिपचिपी कालिख

मेरे अंतस में नाच रही थी

मैंने उसे कहते हुए सुना :

‘‘मेरी बेटी बस कुछ दिन पहले ही

पंद्रह साल की हुई है

तुम उसका आनंद लो,

मैं जल्दी ही आता हूँ,

वैसे भी तुम्हारी बस तो नौ बजे है’’

मेरे ऊपर आकाश टूट पड़ा

और एक पिता का छलबल भी

दुबली और लंबी,

रबर की तरह ठंडी और निरुत्साह वह लड़की

जब उसने केंचुए जैसे अपने पतले से पाँव फैलाए

मैंने वहाँ एक भूख देखी

मेरी भूख जैसी नहीं,

दूसरी तरह की

एक मछली की तरह रेंगती हुई,

छटपटाती हुई

स्रोत :
  • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
  • संपादक : अविनाश मिश्र
  • रचनाकार : जयंत महापात्र

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