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एक दुइ ठु होतें लरिका

ek dui thu hoten larika

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

एक दुइ ठु होतें लरिका

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    एक दुइ ठु होतें लरिका ओनका सउक से पालित,

    काहे होत चिकचिक काहे का मचत हल्ला,

    छोटका देखावै चड्ढी बड़का देखावै बूसट

    बीतत चैत ओझरिगा मलकिन देखावें गल्ला।

    पछताई बहुत मुल अब पछताने काउ होई,

    जब खेत चुनिगै चिरई बस टुकुर-टुकुर ताकी,

    पेटै कि भठाई मा जरिगै सगर जवानी

    भगवान उहै जानै अब कौन करम बाकी।

    ना हीक भै खियाए ना हीक भै पहिराए,

    कौनौ सउक पुरए पहिले जौ चूक होइगै,

    लरिकन कै दसा लखिके कसिके करेज फाटै

    रोटी के बरे रोवैं हिरदय हूक होइगै।

    चोट कुजगहाँ के केका भला देखाई,

    देखिन के का करी केउ आनै तान बोली,

    केउ बाँटि लेई अब आपन बिपति कै गठरी

    खोलब जौ कहूँ मुहना दुनिया करी ठिठोली।

    देखा तनी परोसी निकरै जौ झारि बुल्ला,

    लरिकन के देखि हमरे मुह हँसि के फेरि ले थीं

    लरिका जौ कभौ ओनकै हमरेन के लगै आवैं

    बाँधा थीं देखि चभुरी अँखिया तरेरि ले थीं।

    सब साह मोहल्ला मा बस चोर हमरे घर मा,

    कुछ जाइ केउ चोरी लरिकन हमरे लावैं,

    पिंसिल रबर से लैके लोटा गिलास तालुक

    केउ छोड़ि देइ कतहूँ हमरे घरे मु धावैं।

    काटेस केहू के चुटकी, केउ-केउ मुह बिराएस,

    संझा सबेर रोजै कउआ गोहार लागै,

    ओका धैकै पटकै ओका धैके नोचे

    परिवार के नैया अब कइसे पार लागै।

    करनी अपनी झँखी किसमत अपनी रोई,

    आठइ बरिस नौ नौ लरिकन कै भीर होइगै,

    एक ठू चढ़ाए टेंटे दूसर सँभारे पेटे

    ओनकै भरी जवानी झिलगा सरीर होइगै।

    दुसमनौ कै घर मा नौबत कभौ आवै,

    निरबंस नास देखें बहुबंस नास देखे,

    मन आन करै खातिर सोचे कि कहूँ जाई

    साढू सार, जेह मूँ चितए उदास देखे।

    कबहूँ दवौ कि खातिर निकरै बात सोची,

    लँगड़ी फउज के मारा निस्तार कहूँ नाहीं,

    ओनके जिए असि के कसि के गरेस लागै

    जिनगी रात सगरौ भिनसार कहूँ नाहीं।

    सूरज कि नाई बेटवा चंदा कि नाईं बिटिया,

    एक दुइ ठु कहूँ होतेन घरवा अँजोर होतै,

    दुइनौ परानी हमहूँ हँसि-हँसि के दिन बिताइत

    लरिकन के हँसे हमरिउ डेहरी भोर होतै।

    जोड़ा थै कौनौ पंचर करिखा मुहे पोते,

    मुह बाइ के भरा थै सैकिल हवा कौनौ,

    कौनौ के हाथे कट्टा केउ लाटरी परचा

    परिवार होइगा चौपट, नाहीं दवा कौनौ।

    केउ लड़खड़ात आवै, केउ बड़बड़ात आवै,

    दपकत कि केहू आवै, कौनौ नेपात आवै,

    काजे परोजने मा असि के धमाइ लागे

    कँगला के घरे जइसे कौनौ बरात आवै।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 41)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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