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सुबह-सवेरे

subah—sawere

अनुवाद : अशोक जेरथ

ज्ञानेश्वर

ज्ञानेश्वर

सुबह-सवेरे

ज्ञानेश्वर

सुबह-सवेरे, हर सुबह

पूरब की ओर से/टूटता है...

उड़ेल दिया जाता है/रोशनी का सैलाब

डूब जाते हैं/नदी-नाले, नगर और जंगल

घुल जाती है/अँधेरे की कालिख

और बाद दोपहर/लग जाते हैं हवा को पैर

नहा उठते हैं/शहरों के शहर

रचनाकार की क़लम से,

उभर आती है/ताज़ा सोच

मुसाफ़िरों/पथिकों को/मिलता है सफ़र

खुल जाते हैं नावों के/बादवान

जीवन मुखर करता है/अपना रूप

खोल देता है/अपने छुपे भेद

जीवों के लिए/जीवन के लिए

हर रोज़ ताज़ा होने के लिए

सुबह/हर सुबह-सवेरे।

(मूल शीर्षक: बड्डलै नित बड्डलै)

स्रोत :
  • पुस्तक : आधुनिक डोगरी कविता चयनिका (पृष्ठ 108)
  • संपादक : ओम गोस्वामी
  • रचनाकार : ज्ञानेश्वर
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी
  • संस्करण : 2006

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