रेगिस्तान में बारिश

सुमेर सिंह राठौड़

रेगिस्तान में बारिश

सुमेर सिंह राठौड़

और अधिकसुमेर सिंह राठौड़

    अचानक से आसमान अपना रंग बदल देता है

    बरगद के पत्ते देखने लगते हैं आसमान के पानी को

    अब आसमान नीला रंग छोड़कर धूल से भर चुका है

    चारों तरफ़ आवाज़ें हैं कि मेह बरसेगा अब

    पेड़ों से लटकते बच्चे भागकर घरों में घुस गए हैं

    भीगना बच्चों को पसंद है

    लेकिन माँएँ उन्हें भीगने नहीं देतीं।

    इस देस में बारिशें बहुत कम होती हैं

    लेकिन होती हैं तो ख़ूब डरावने अँधेरे से भरी

    बाड़ों में बछड़ों के खुरों तक भर आता है पानी

    घने पेड़ों से झड़ने लगती हैं अधमरी चिड़ियाँ

    खड़ी फ़सलों पर तैर जाती है ओलों की सफ़ेदी

    किसान कभी खेत को देखता है कभी आसमान को।

    छत से टपकता पानी रिसकर अनाज को छूने लगता है

    दीवार से टकराकर गूँजने लगती हैं आवाज़ें

    स्त्रियों के बाज़ुओं में खिल उठती है दबी हुई ताक़त

    रात की बारिश के बाद का दृश्य है यह

    धीरे-धीरे साफ़ आवाज़ों में बोलने लगते हैं झींगुर

    रह-रहकर चमकती बिजली में मुँडेर पर दीखता है आसमान।

    बारिश के बाद खिल उठता है यह देस

    दिन उगते ही मोर छेड़ देते हैं राग अल्हैया बिलावल

    रेत से निकलकर महक सारे गाँव में फैल जाती है

    रेत के टीलों पर खरपतवार की तरह उग आते हैं बच्चे

    वैशाख के मौसम के रंग झरने लगते हैं आसमान से

    धीरे-धीरे आसमान सफ़ेद होकर ढँक लेता है धरती को।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमेर सिंह राठौड़
    • प्रकाशन : सदानीरा वेब पत्रिका

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