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बाढ़िक हकरोस

baDhik hakros

आरसी प्रसाद सिंह

आरसी प्रसाद सिंह

बाढ़िक हकरोस

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    फेर चौपट भेल जीवन, फेर उपवन ध्वस्त

    भुखमरीसँ फेर जनता त्रस्त, अस्तव्यस्त।

    फेर कोशी धार उमतलि, गण्डकीमे ज्वारि।

    बाग्मती, कमला, बलानो पुनि उठलि ललकारि।

    प्राण काँपल, रोम भए गेल ठाढ़, स्वर अवसन्न।

    की मनुक्खक गप्प? कुकुरोकेँ ने भेटतय अन्न।

    एक तँ मँहगी विकट लेलक रुधिर सब काढ़ि।

    ताहिपर प्रलय-वर्षा, जान-लेबा बाढ़ि।

    ओह रे दुर्भिक्ष पर दुर्भिक्ष हा हन्त।

    आबि गेलछि आब मानव-जीवनक की अन्त।

    फेर तँ मँडराय लगले गीध झुंडक झुंड।

    फेर नढ़िया केर दल-बल ताकि रहले मुंड।

    कोन दिस हम जाउ? की हम करू? की लऽ गाउ?

    घर आँगन-बीच पोखरि-पानि, भासल नाउ।

    फेर की खरिहान खेतक कहु हम हाल?

    बाढ़िमे बहि गेल मानव, की मवेशी-माल।

    एहन आपत्काल, बिसरल बैरियो अरि-भाव।

    साप-मूसक मिलन देखल, रंग भेटल-राव।

    के कहौ? की प्रकृति रूसल? भाग्य की विपरीत?

    संतुलन की आइ धरणीक भेल अछि भयभीत?

    की मनुक्खक दोष? अथवा की विधाता बाम?

    कोन अस्तित्व बोधक कंटकित आयाम?

    पानि; केवल पानि, आँखिक दृश्यता धरि पानि।

    अन्न की? ने माटियो केर आइ कोनो मानि।

    विषमता देखि पिघलय पाथरो केर प्राण।

    फेर की रहि जाय बइसल वैभवक वरदान?

    की करय विद्रोह दुर्बल अस्थि कंकाल?

    क्रांतियो लै शक्ति चाही, चेतना केर ज्वाल।

    भूखमे डूबल पियासल जन-जनक हकरोस।

    पानि हेलैत-भासल जाइ छै संतोष।

    रक्त चाही विप्लवी जे उनटि कऽ युग-यक्र।

    राखि दिऔ, से भऽ सकै अछि चन्द्र कोनो वक्र।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 64)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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