Font by Mehr Nastaliq Web

निबोधन

nibodhan

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    अधिकारे की अपन जनइते रहबेँ तोँ निष्प्राण!

    कर्त्तव्यो पर किंचित् देबेँ कोनो दिन तोँ ध्यान?

    की कैलकौ? की देलको तोरा देश, समाज कि आन?

    सतत यैह चिन्तामे रहलेँ अनुखन तोँ म्रियमाण!

    कखनो सोचलेँ, तोरासँ भेलै की उपकार?

    तोहर हाथे उतरल कखनौ ककरो माथक भार?

    आनेपर तोँ रिक्त करै छेँ अप्पन रोषक कोष!

    सूझि पड़ै छौ कनिको तोरा किए ने अप्पन दोष?

    परम्परासँ कटि कऽ बनबै छेँ तोँ अप्पन पन्थ!

    गेलौ भविष्यक संगे वैभव विपुल अतीतक, हन्त!

    पैत्रिक सम्पति बेचि पेट तोँ भरलेँ राजकुमार!

    हाथ पसारै छेँ, भिक्षुक बनि आइ विदेशक द्वार!

    के तोँ छलेँ, मोन तँ पारहि, हे प्रिय प्राण स्वदेश!

    पतनके उत्कर्ष बुझै छेँ, सौभाग्ये केँ क्लेश!

    पार्थ जकाँ तो मोह-ग्रस्त छेँ, स्मृतिक भेल छौ नाश;

    जीवन-समर विमुख भऽ भोगै छेँ कुण्ठा-संत्रास!

    आइ तोरा ले चाही पौरुष, पाञ्चजन्य-उद्घोष

    तरल आगि, जे भरय रुधिरमे लगन, शहीदी जोश!

    देशक माटि-पानिसँ उपजल सफल ज्ञान-विज्ञान!

    जाग, जाग, लऽ हमर देश तोँ पुरुष पुरातन-प्राण!

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 36)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY