एक संविदा-कर्मी से बातचीत

अखिलेश सिंह

एक संविदा-कर्मी से बातचीत

अखिलेश सिंह

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    यही नौकरी मिली तो बियाह किया

    इसी के बल पर दो बच्चे किए

    आता रहा दिल्ली, जाता रहा

    गर्द किए हज्जारों रुपए

    बीवी-बच्चों को दस दिन भी साथ रख पाया

    अम्मा जब तक ज़िंदा रहीं,

    अलग ही रही परेशानी

    वो मर गईं, मर ही गईं

    बीवी अब रहती है उसी घरुही

    मैं रहता हूँ गुड़गाँव,

    आता हूँ दिल्ली,

    करता हूँ यहीं नौकरी

    पी लेता हूँ, पेट भरकर रॉयल स्टैग—

    छँट जाते हैं

    सब बादल

    कुछ देर, बस कुछ ही देर।

    नौकरी अब नहीं रहेगी

    अपर सचिव की अपनी चाल है

    उन्हें खड़ा करना है अपनी फ़ौज

    साल दो हज़ार नौ था, जब जॉइन किया था

    मैंने कब चाहा कि मेरी पक्की कर दो!

    बच्चे पल रहे हैं

    अरे उन्हें तो पलने दो।

    क्या साहब, आप भी सूखे मुँह में पान पकड़ाते हैं!

    मैं मर जाऊँगा अगर मेरे बच्चों को हुई तकलीफ़

    उनकी ग़लती ही क्या!

    हर साल एक पगार नक्को करता हूँ

    बचाता हूँ नौकरी, ज़िंदगी से तवक़्क़ो रखता हूँ

    किसी का नंबर नहीं करता हूँ डिलीट।

    क्या कहते हो साहब!

    मेरा धरम-करम जीवन को देता धक्का है

    जो भी काम करूँ, उसमें कुछ भी तो नहीं पक्का है

    ज़िंदगी दाँव पर लगाई

    और आता ही रहा हूँ, पूरी महामारी में

    दस और एक, ग्यारह साल हो गए हैं

    नौकरी की सीखी सब चाल

    क्या पुराने गुसैंया को करते हैं फटेहाल?

    करता रहता हूँ फ़ोन टैम-टैम पर

    तुम जैसे सभी बबुआन को

    कि जाने कहाँ से निकल आए जुगाड़

    और छँटनी की लिस्ट से

    छँट जाए मेरा नाम...

    स्रोत :
    • रचनाकार : अखिलेश सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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