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पुल

pul

अनुवाद : सुरेश सलिल

एक फैली और तेज़ बहती नदी के किनारे खड़ा मैं

बिल्कुल आश्वस्त नहीं था

कि इस पुल को

जो पतले और कमज़ोर सरकंडों से बना है,

पार कर सकूँगा।

इसीलिए मैं एक तितली की तरह

सुकुमार चाल चलता रहा,

फिर एक हाथी की तरह झूमते-झूमते,

उसके बाद एक नर्तक की भाँति

सधे पाँवों

और आख़िरश्

एक अंधे आदमी की तरह

टोहते-टोहते।

हल्का-सा भी यक़ीन नहीं था मुझे

कि इस पुल को पार कर सकूँगा,

और अब

जबकि नदी के दूसरे छोर पर खड़ा हूँ

यक़ीन नहीं होता

कि मैंने ही इस पुल को पार किया है!

स्रोत :
  • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 60)
  • रचनाकार : लियोपोल्द स्ताफ़
  • प्रकाशन : मेधा बुक्स
  • संस्करण : 2003

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