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बिछड़े दोस्त को याद करते हुए

bichhDe dost ko yaad karte hue

कुंदन सिद्धार्थ

कुंदन सिद्धार्थ

बिछड़े दोस्त को याद करते हुए

कुंदन सिद्धार्थ

और अधिककुंदन सिद्धार्थ

    आजकल कहाँ हो फ़ख़रुद्दीन?

    नरकटियागंज में कभी दिखते नहीं

    हरिनगर जिसके आस-पास किसी गाँव के रहने वाले हो

    जब भी गया आँखें तुम्हें ढूँढ़ती रहीं

    कौन-सा गाँव था तुम्हारा, भूल गया

    लेकिन तुम याद रह गए फ़ख़रुद्दीन

    जब भी आती है ईद, बक़रीद और मुहर्रम

    सबसे पहले तुम्हीं याद आते हो

    और आँखें भींगो जाते हो

    ब्लॉक रोड चौक से पचास क़दम पहले 

    उस घर के सामने से जब भी गुजरता हूँ

    जिसमें तुम अपने अब्बा रहीम सर के साथ रहते थे

    तुम्हें ढूँढ़ता हूँ, वह घर बदल गया है

    लगता है तुमने बेच दिया उसे

    क्यों बेच दिया फ़ख़रुद्दीन?

    बेचकर गाँव चले गए

    या रोजी-रोटी की तलाश में निकल गए दिल्ली

    कुछ भी तो पता नहीं चलता

    हाईस्कूल में मिले थे हम

    अब तो मेरे बच्चे भी हाईस्कूल पास कर गए

    तुम्हारे बच्चे कैसे हैं? कहाँ हैं आजकल?

    उनकी पढ़ाई-लिखाई, शादी-ब्याह करके 

    निश्चिंत हो गए कि अभी भी उलझे हो

    घर-गृहस्थी के मायाजाल में?

    अब्बाजान रहीम सर कैसे हैं?

    मेरे पिताजी गुजर गए पिछले बरस 

    जिन्होंने भेजा था मुझे तुम्हारे साथ बेतिया

    दसवीं बोर्ड की परीक्षा देने

    तुम्हारे बनाए चावल और आलू परवल की सब्जी का स्वाद

    क्या मैं कभी भूल सकता हूँ मेरे दोस्त?

    उस लड़की का क्या हुआ फ़ख़रुद्दीन

    जिसे तुम बेपनाह मुहब्बत करते थे

    क्या उसी से शादी हुई

    या टूट गई मुहब्बत?

    हमारे समय में मोबाइल नहीं था

    अगर होता तो हम दोनों इस तरह बिछड़ते नहीं

    गाहे-बगाहे बातें करते देश-दुनिया की

    और कुछ नहीं तो कम से कम 

    एक साथ रोते या फिर ठठाकर हँस पड़ते

    तुम्हारे हँसी आज भी मेरे कानों में 

    मिश्री घोल जाती है फ़ख़रुद्दीन

    पता नहीं हमारे देश में कैसी हवा चल रही है आजकल

    कि लोग अब कपड़ों, भाषा और धर्मस्थलों के आधार पर

    तय करने हैं अपने दोस्त और बात-व्यवहार

    मैं उस समय के लिए क्यों तरसूँ

    जब दिल से दिल के तार जुड़ते थे

    और हम हो जाते थे एक-दूसरे के दोस्त

    कपड़े, भाषा और धर्मस्थल 

    कभी हमारी चर्चा में नहीं आते थे

    तुम्हारी सिखाई उर्दू वर्णमाला 

    आज भी मुझे अच्छी तरह याद है फ़ख़रुद्दीन

    मुझे भरोसा है मेरे सिखाए संस्कृत के श्लोक

    तुम भूले नहीं होगे

    ईद के दिन तुम्हारी भेंट की हुई जालीदार टोपी

    जिसे बड़े जतन से संभाल कर रखा है मैंने

    सर पे डाले तुम्हें नम आँखों से याद कर रहा हूँ मेरे दोस्त

    अगर मेरी कविता घूमती-भटकती तुम्हारे पास पहुँचे

    तुंरत मेरे मोबाइल नंबर 7024218568 पर

    फोन करना फ़ख़रुद्दीन

    बड़ी बेसब्री से ढूँढ़ रहा हूँ तुम्हें

    पिछले तीस बरसों से

    स्रोत :
    • रचनाकार : कुंदन सिद्धार्थ
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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