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बरगद

bargad

अखिलेश जायसवाल

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    उसकी उसकी घनी, लंबी और धूसर दाढ़ी में

    बसा हुआ है कथाओं का एक संसार।

    क़िस्सागो तोता-मैना, तिलस्मी शैतान,

    फरेबी बंदर, ऐंद्रजालिक और परियों से

    लदी हुई हैं उसकी डालें।

    कितनी सभ्यताओं का शैशव

    सोया है उसके तंद्रिल क़िस्सों से।

    उनकी कथाओं में सूत्रधार की तरह आता है वह

    और उनकी आँखों की रंगशाला में

    जमुहाई की अंगुलियाँ थामे

    जैसे ही पहुँचती है नींद

    चला जाता है नेपथ्य में

    अगले दिन की कथा बुनने।

    रहस्य रोमांच और कौतूहल के गोदे

    चूते हैं उसकी घनी छाया में।

    'बहुपाद' आख़िर वह यूँ ही तो नहीं

    दुनिया की कितनी संस्कृतियों को

    उसने पैदल ढोया है।

    पूजा गया है उसका शाश्वत बुढ़ापा,

    कभी अलसाई नहीं हैं उसकी बूढ़ी आँखें

    और एक सजग संरक्षक की तरह

    खड़ा है उसे दौर से

    जब हमारे कपड़ों की परिकल्पना

    बुनी थी पत्तों से।

    जरा सी ठेस लगी नहीं कि

    लेकर खड़ा हो जाता है अपने लेप

    और सदियों के परीक्षित नुस्ख़े।

    आर्य मनीषा का वह प्राचीन सहपथिक है

    सूक्ष्म से विराट की अंतर्यात्रा में।

    और ख़ूब पढ़ी गई है

    बीज में विराट के लेखन की

    उसकी कूट भाषा।

    वैदिक शास्त्र कृतज्ञ हैं

    उसकी चिकित्सकीय क्षमता से

    और दर्शन उसकी दृष्टि से।

    उसके पास है जीवन के विस्तार, सघनता

    और प्रवाह की कुंजी—

    'जितनी शाखाएँ उतने वृक्ष'—

    यावत्यः शाखास्तावन्तो वृक्षाः॥*

    स्रोत :
    • रचनाकार : अखिलेश जायसवाल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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