ओठों पर मुस्कान की ज्योत्स्ना जागी, आखिल विश्व में उषा बिखर गई,
मानव-उर में गीत मचलने लगे, जैसे निर्जन में पुष्प खिले,
बुद्धि आँखें मलती हुई, अँगड़ाई लेती हुई, जागी, जैसे खान से छिपे हीरे निकले,
प्रत्येक सम-वय युवक और युवती के सौंदर्य और भाव प्रीति से अनुप्राणित हुए,
भाव-समूह ने श्रम से ताल लिया और झूमते खेतों से नृत्य की लय,
सागर, सूर्य, लहर और मरुभूमि में रूपास्वादन की भूख फिर से चमकी।
आलोक दबे पाँव चला, मानव बुद्धि ने वहशत के कुहासे छान डाले,
ये विकट दुःख अकेले न कटेंगे, लोग ऐक्य की सदुपयोगिता को जान गए,
सबने कुँआरी धरती की प्रीति का वरण किया और मिलकर उसके वक्ष
का आस्वादन किया,
मानवराज ने सब शक्तियों पर विजय पाई; जल, पवन उसके पनिहार बने,
ललितकला और धर्म के पुष्प हँसे, एशिया ने इनको लोरी दी,
इस प्रकार कई युग उपरांत सभ्यता कौमार-प्राप्त हो भारत-यूनान
में फाग खेलने लगी।
प्राच्य धरती की समृद्धि-गाथा महक के समान अखिल विश्व में फैल गई—
उसकी धरती स्वर्ण उगलती है, वहाँ श्रम पूर्णतः पुरस्कृत होता है।
लोग सागर चीरकर यहाँ व्यापार हेतु आए और छल-छद्म से हलधरों की
समृद्धि हथिया ली।
जो पड़ोसिन आग माँगने के लिए आई थी, वह मालकिन बन बैठी, यह
देखकर हलधरों के जुए रो दिए।
जो हमारे यहाँ आजीविका के लिए आया था, वही 'कला-पालने’ का
स्वामी बन बैठा
उसने जोंक के समान लोगों का रक्त चूस लिया और सबको मृत्यु-पाश में बाँध लिया
आख़िर सुप्त रोष की निद्रा भंग हुई, समय की माँग की पूर्ति तो होकर ही रहती है।
निर्धन के नयन कुपित हुए, बंदी लौह-शृंखलाओं को घूरने लगे
दासों के अंतस में पवित्र घृणा का जन्म हुआ, अब वे भाग्य को नहीं कोसते,
अब अमर स्वातंत्र्य की पौ फटी है, अब जन-युग आ पँहुचा है
लो, वह विप्लव-गान छिड़ा, रूपसी धरतियों ने गीत आरंभ किया
विद्युत-समूह के चमकने पर धरती चौंक पड़ी, विजित-प्राय नरदों की बाज़ी पलटी।
आग यहाँ दबी थी, उसकी लपटें कहीं दूर निकली, स्थान-स्थान पर
स्वतंत्रता के ध्वज फहरने लगे
विप्लव छिड़ा, आतंक का हृदय काँपा, ध्वंसक पराधीनता की अवधि समाप्त हुई
'भोले जाट ने पगड़ी संभाल ली', उसकी गाधी का भाग्य जागा।
धरती ने सोचा कि हलवर भूखों न मरे तथा राज-कन्याओं का रूप
परतुष्टि का साधन न बने
सैकड़ों वीर फाँसी के रस्से पर लहरा गए, किंतु इंक़िलाब की वाणी न मिटी
साम्राज्य की आयु अशेष हुई, अब लेखे-जोखे का दिन आ पहुँचा।
युद्ध छिड़ा, डाकू परस्पर लड़ने लगे, साँड़ों की इस भिड़ंत में निरीह
वनस्पति की अनिवार्य हानि हुई
लाखों माँ-रानियों के पुत्र मरे, लाखों युवतियों का जीवन अंधकारमय हुआ
अंत, सूनी माँग और ममता की आह विजयी हुई, तोपों की अविलंब पराजय हुई
जंगबाज़ों के ताबूत में अंतिम मेख ठुक गई, एशिया में फिर से अरुणोदय हुआ
दिया जला ही था कि इसे बुझाने के लिए शटो ने फिर से आँधी उठा दी
दिया जलता रहा, आलोक अमर हो गया, अंधकार को सुझाई नहीं देता था
कि क्या करे।
लोगों ने देखा कि घायल सर्प मानव पर घातक प्रहार करने से न चूकेगा
यह दैत्य मृत्यु-वाणिज्य के लिए अवश्य ही नए युद्ध की नींव रक्खेगा
ज्योतिर्मान मस्तिष्कों ने संगठित होकर इसके सभी प्रहार अपने ऊपर
सहने का निश्चय किया।
संसार ने देखा कि शांति की बाढ़ के सामने, जंगबाज़ की सब चालें मात
पड़ रही है और उसकी पराजय निश्चित है।
संसार शांति के मोरचे पर इकट्ठा हुआ, ऐक्य की भावना चरम कोटि तक
पहुँच गई है।
बायीं एशिया में ऐक्य स्थापित होने पर सब लोगो को शांति-मार्ग
सुझाई देने लगे हैं।
हमारे बीच बुद्धि, कला और क्रांति की एकता है, प्राचीभर की पवित्र प्रभात
एक ही है।
प्राची के सब देश ही सभ्यता का झूला हैं, गंगा, वोल्गा और यंगसी की
गाथा एक ही है।
बुद्ध द्वारा प्रदत्त साजात्य कला-उपहार हमारे पर्वतों के वक्ष पर उत्कीर्ण है
अपने जीवन के साझे प्रकाश की सौगंध, हमारे प्रदीत दिन और टिमटिमाती
रातें भी साझी हैं।
एशिया का साम्राज्य जगत्-रक्षक है, कोई हमारे भविष्य में आग न लगा सकेगा
हमारा जीवन स्वर्णमय हुआ चाहता है, कोई इस अमृत मे विष न घोल दे।
- पुस्तक : भारतीय कविता 1954-55 (पृष्ठ 541)
- रचनाकार : गुरचरण सिंह रामपुरी
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी
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