अपनी ओर लौटते हुए
apni or lautte hue
एक
वो थी तो बादलों के अलग-अलग नाम बताती
मुझे याद करवाती
आम्र-बौर का गीत सुनाती
कौन कनु कौन उनकी प्रिया
मैं पूछता
वो बताती
बार-बार बताती
उसी के चिन्हवाए हैं ये
बंसीबट
पलाश
शिरीष
अमलतास
उसके पीछे-पीछे ही पहुँचा मैं
पुस्तकालय
मंदिर
उसी से सीखा है
हाथ जोड़ना
शीश झुकाना
और
रोकर दर्द बहा देना
उँगलियों के बीच सिगरेट थी
उसने ही मोम रंग पकड़वाया
ढलती शाम
डूबते सूरज को आँकना सिखाया
उसका जाना तो असंभव लगेगा ही
जिसके साथ
आसमान में हमेशा से रहे
ध्रुव तारे को पहली बार पहचाना था
चाँद में कूदता ख़रगोश दिखा था
तारों को जोड़-जोड़ कालपुरुष बनाया था
सिर पर घूँघट लिए
छम-छम करती वो चली गई
अपनी सारी किताबें
सारे रंग मेरे पास छोड़
उन्हे सँभालने को कह
उसने विदा ली।
दो
वो थी तो अलग-अलग बादल भी थे
अलग-अलग थे उनके नाम
बादल अब पहले जितने
नीले नहीं लगते
अपने नहीं लगते
लगता नहीं अब
तारों का कालपुरुष
कभी बना पाऊँगा
पिंजड़े से जितने पंछी उड़ाए थे उसके साथ
अचाकान किसी ने क़ैद कर लिए
उसके बिना लगता नहीं
उन्हें फिर से आज़ाद कर पाऊँगा
उसका जाना
मोहल्ले के आख़िरी पेड़ का कटना
आँगन के गौरैये का उड़ जाना और कभी न लौटना और
कठगुलाब का अचानक सूखना
इतनी चीज़ों का एक साथ हो जाना
मुझे अस्थिर कर गया
इस बार बारिश भी देर से आई
सो सँभलने में वक़्त थोड़ा ज़्यादा लग गया।
- रचनाकार : उमा भगत
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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