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अंतराल के बाद

antral ke baad

सरबजीत गरचा

सरबजीत गरचा

अंतराल के बाद

सरबजीत गरचा

लंबाई चौड़ाई गहराई

और इन्हें सूई की तरह बेधता समय

मिलकर बनते हैं चार आयाम

जिन्हें भौतिकीविद काल-अंतराल कहते हैं

इस काल-अंतराल में पनपते हैं सारे दु:स्वप्न

जो बार-बार हमसे टकराते हैं

नींद उन्हें बाँधने में हमेशा नाकाम रहती है

दु:स्वप्न घूमते रहते हैं बेपरवाह

घुलते जाते हैं तेज़ी से बढ़ रही भीड़ में

डालते हैं एक विशाल काला पर्दा

दुनिया के सारे सुंदर दृश्यों पर

हमारी चेतना के रेशों से बुना धागा

सूई के छेद में एक ही तरफ़ से डाला जा सकता है

उस पर हमारी मर्ज़ी नहीं थोपी जा सकती

उसकी यात्रा की दिशा हमेशा

भूत से भविष्य की ओर रहती है

फिर भी दु:स्वप्न उससे जुड़े रहते हैं

हमारा अस्तित्व सूई के छेद के आकार

और गहराई में क़ैद है

उस महीन खिड़की में

वर्तमान सिर्फ़ एक इंतज़ार है

धागा हमें छूकर गुज़रता है

और उस पर लगी कालिमा को हम

काजल मानकर लगा लेते हैं अपनी आँखों में

लेकिन हम उस पर सवार होकर

या उसके सहारे झूलकर

किसी भी दिशा में नहीं जा सकते

इसके बावजूद दूर भविष्य में

हवा चाहे जितनी ख़ुश्क हो जाए

धागे में जगह-जगह समाई नमी को

सुखा नहीं पाएगी

धागे को आँखें मूँदकर छूने वाले हर प्रेमी को

एक दिन दिखाई देगी

सूई के छेद से छनकर आती स्वछ निर्मल रोशनी

जो कर देगी पृथ्वी पर पानी की

प्रत्येक बूँद को इतना प्रज्ज्वलित

कि बूँद-बूँद में झलकने लगेंगे एक के बाद एक

खिड़की के उस पार के समय में समाए वे सारे क्षण

जिनमें उसके अनगिनत अपनों ने बहाए थे आँसू

और किया था रोशनी को

दु:स्वप्नों की कालिमा से मुक्त

स्रोत :
  • रचनाकार : सरबजीत गरचा
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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