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अंतिम शरणगाह

antim sharangah

कुंदन सिद्धार्थ

कुंदन सिद्धार्थ

अंतिम शरणगाह

कुंदन सिद्धार्थ

और अधिककुंदन सिद्धार्थ

    दुख की एक नदी थी

    जिसमें हम दोनों को उतरना था

    हम प्रेम करने लगे

    सुख का एक आकाश था

    जिसमें हम दोनों को उड़ना था

    हम प्रेम करने लगे

    अपने खारे आँसुओं से 

    हमने मीठे पानी की एक झील बनाई

    और उम्र भर नहाते रहे

    कोमल भरोसे से खड़ा किया

    प्रेम का ऊँचा पहाड़

    और शिखरों पर चढ़ इठलाते रहे

    हमने उम्मीदों का 

    एक हरा-भरा जंगल लगाया

    और भटकते रहे 

    बेपरवाह

    बावजूद इसके

    प्रेम को नहीं मिल पाई साबूत ठौर

    कि हम आँख मूँद सुस्ता सकें 

    देह मिट जाने तक

    हम सिर्फ़ सपनों में मिलते रहे

    वहीं पूरी कीं सारी इच्छाएँ

    हम प्रेम करते थे

    सपने ही बने 

    हमारी अंतिम शरणगाह

    स्रोत :
    • रचनाकार : कुंदन सिद्धार्थ
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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