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अंतर्यात्रा

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कुमार विकल

कुमार विकल

अंतर्यात्रा

कुमार विकल

और अधिककुमार विकल

    काली हवा का एक झोंका कहीं से आता है

    और मेरा परिवार, प्रियजन, दोस्त, दुश्मन

    घर 'नगर' बाज़ार

    मुझसे कहीं दूर चले जाते हैं

    या मैं ही कहीं दूर चला जाता हूँ

    काली हवा के संग

    हिम-प्रदेशों की ओर

    बर्फ़ की शिलाओं पर

    और सहसा पहुँच जाता हूँ किसी अंधी गुहा में

    जहाँ चारों ओर फैला हुआ ठंडा अँधेरा है

    इसी ठंडे अँधेरे में

    यात्रांत की प्रतीक्षा में

    मेरे शरीर पर कुछ हिमशिला-सा टूटता है

    और लगता है कि मेरी देह के

    सारे धर्म अब छूट जाएँगे

    आलोकित रास्तों के पेड़-पौधों पत्तियों से

    सभी नाते टूट जाएँगे

    तभी मैं देखता हूँ

    हिमगुहा के द्वार पर शायद कोई क़ंदील जलती है

    जो जलते इंगितों से

    मेरे हिमबद्ध शरीर को वापिस पुकारती है

    इसी धुँधले इशारे पर मैं वापिस लौट आता हूँ—...

    कि घर नगर परिवार प्रिय जन प्रतीक्षारत होंगे

    आग के तोरण सजाकर

    मुट्ठियों में आँच भर

    स्वागत करेंगे।

    मगर—

    जब नगर में पहुँचता हूँ

    तो सब कुछ बदला हुआ महसूस होता है

    कि सारे शहर में कहीं भी आग नहीं

    दिन में धूप नहीं

    घर में आँच नहीं

    और मैं हिम-प्रदेशों का यात्री

    अपने शरीर पर काली हवा का बोझ

    नसों में दौड़ता हिम ज्वार लेकर

    जाऊँ—

    तो किस आग की नदी के पास जाऊँ

    कौन-सा सूर्य-द्वार खटखटाऊँ

    स्रोत :
    • पुस्तक : निषेध (पृष्ठ 157)
    • संपादक : जगदीश चतुर्वेदी
    • रचनाकार : कुमार विकल
    • प्रकाशन : ज्ञान भारती प्रकाशन
    • संस्करण : 1972

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