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मुझे पता है पिंजरे का पंछी क्या गाता है

mujhe pata hai pinjre ka panchhi kya gata hai

अनुवाद : सरिता शर्मा

माया एंजेलो

माया एंजेलो

मुझे पता है पिंजरे का पंछी क्या गाता है

माया एंजेलो

और अधिकमाया एंजेलो

    मुक्त पंछी फुदकता है

    हवा के परों पर

    और नीचे को बहता है

    झोंके के छोर तक

    और अपने पंखों को डुबोता है

    सूरज की नारंगी किरणों में

    और आकाश पर हक ज़माता है।

    मगर जो पक्षी पड़ा रहता है

    अपने तंग पिंजरे में

    शायद ही देख पाए

    अपने क्रोध की सलाख़ों के पार

    कट गए हैं उसके पँख

    और पाँव जकड़े हैं

    तो वह गाने के लिए मुँह खोलता है।

    बंदी पक्षी गाता है

    डरे हुए स्वर में

    अज्ञात बातों के बारे में

    मगर जिनकी अब भी चाहत है

    और उसकी धुन सुनाई पड़ती है

    कहीं बहुत दूर पहाड़ी पर

    क्योंकि बंदी पक्षी आज़ादी का गीत गाता है।

    मुक्त पक्षी के ख़यालों में है कोई और समीर

    और सरसराते पेड़ों से बह कर आती हवाएँ

    और भोर के उजले बग़ीचे में इंतज़ार करते मोटे, ताज़े कीड़े

    और आकाश को अपना कहता है।

    लेकिन बंदी पक्षी सपनों की क़ब्रगाह पर है

    उसकी छाया चीख़ती है दुःस्वप्न की चीत्कार पर

    कट गए हैं उसके पंख और पाँव जकड़े हैं

    तो वह गाने के लिए मुँह खोलता है।

    बंदी पक्षी गाता है

    डरे हुए स्वर में

    अज्ञात बातों के बारे में

    मगर जिनकी अब भी चाहत है

    और उसकी धुन सुनाई पड़ती है

    कहीं बहुत दूर पहाड़ी पर

    क्योंकि बंदी पक्षी आज़ादी का गीत गाता है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : विश्व की श्रेष्ठ कविताएँ (पृष्ठ 90)
    • रचनाकार : माया एंजेलो
    • प्रकाशन : इंडिया टेलिंग
    • संस्करण : 2020

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